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क्या 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' जन आंदोलन बन चुका है? पीएम मोदी के 'गुजरात मॉडल' से बेटियों की शिक्षा में क्या बदलाव आया?

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क्या 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' जन आंदोलन बन चुका है? पीएम मोदी के 'गुजरात मॉडल' से बेटियों की शिक्षा में क्या बदलाव आया?

सारांश

क्या 'बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ' अभियान ने सच में समाज में बदलाव लाया है? जानें इस ऐतिहासिक अभियान के पीछे की कहानी और पीएम मोदी के प्रयासों का प्रभाव।

मुख्य बातें

महिला साक्षरता में वृद्धि: 57.80% से 70.73% तक पहुंची।
स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या में कमी: 38.92% से 7.08% तक आई।
42,371 शौचालयों का निर्माण: विशेष रूप से लड़कियों के लिए।
55,181 लड़कियों को आर्थिक सहायता: ‘कन्या केलवणी’ योजना के तहत।
समाज की सोच में बदलाव: शिक्षा की दिशा में सकारात्मक बदलाव।

नई दिल्ली, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत में ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ अभियान अब एक सशक्त जन आंदोलन बन गया है। 11 साल पहले 22 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस अभियान की शुरुआत की थी। राष्ट्रीय स्तर पर इस अभियान के 11 साल पूरे होने पर ‘मोदी आर्काइव’ ने कहा कि यह लड़कियों की शिक्षा और सशक्तिकरण को बढ़ावा देने के लिए पीएम मोदी का एक ऐतिहासिक प्रयास था।

‘मोदी आर्काइव’ ने एक पोस्ट में उल्लेख किया, “‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ का खाका गुजरात में तैयार किया गया था।” यहां खराब महिला साक्षरता दर से लेकर रिकॉर्ड संख्या में बच्चों के स्कूल में रहने तक कई महत्वपूर्ण बदलाव हुए। गुजरात के ‘कन्या केलवणी’ और ‘शाला प्रवेशोत्सव’ ने पहले मानसिकता को बदला और फिर संख्या को।

वीडियो में बताया गया, “साल 2001 में जब नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्री का पद संभाला, तब महिला साक्षरता केवल 57.80 प्रतिशत थी।” उस समय 38.92 प्रतिशत लड़कियों ने स्कूल छोड़ दिया था और 42,000 स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग शौचालय नहीं थे।

मुख्यमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में ठोस कदम उठाने का संकल्प लिया। उन्होंने ‘कन्या केलवणी योजना’ और ‘शाला प्रवेशोत्सव’ की शुरुआत की, जिसका उद्देश्य माता-पिता में जागरूकता लाना था। नरेंद्र मोदी गर्मियों में गांव-गांव जाकर लोगों को समझाते थे कि “कृपया अपनी बेटियों को स्कूल भेजें।” इस दौरान 42,371 शौचालय, 58,463 नई कक्षाएं और 22,758 स्कूलों में बिजली की सुविधा दी गई।

मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने अपने सभी गिफ्ट नीलाम कर दिए और अपनी पूरी सैलरी को डोनेट किया। ‘शाला प्रवेशोत्सव’ के दौरान बेटियों के स्कूल में दाखिल होने पर पूरे गांव में जश्न मनाया जाता था। ‘कन्या केलवणी’ योजना के तहत 55,181 लड़कियों को आर्थिक सहायता दी गई।

इसके परिणामस्वरूप महिला साक्षरता 57.80 प्रतिशत से बढ़कर 70.73 प्रतिशत हो गई, जबकि स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों की संख्या 38.92 प्रतिशत से घटकर 7.08 प्रतिशत पर आ गई। इस प्रकार, ‘बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ’ एक सफल जमीनी आंदोलन बन गया था।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि समाज की सोच में बदलाव लाने का भी प्रयास करता है। यह एक ऐतिहासिक प्रयास है जो देश की प्रगति के लिए महत्वपूर्ण है।
RashtraPress
24 सितंबर 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ अभियान कब शुरू हुआ?
यह अभियान 22 जनवरी 2015 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा शुरू किया गया था।
इस अभियान का मुख्य उद्देश्य क्या है?
इसका मुख्य उद्देश्य लड़कियों की शिक्षा और सशक्तिकरण को बढ़ावा देना है।
गुजरात में इस अभियान के क्या प्रभाव रहे हैं?
गुजरात में महिला साक्षरता 57.80 प्रतिशत से बढ़कर 70.73 प्रतिशत हो गई है।
क्या इस अभियान के तहत कोई आर्थिक सहायता भी दी जाती है?
हाँ, 'कन्या केलवणी' योजना के तहत लड़कियों को आर्थिक सहायता दी जाती है।
इस अभियान का सामाजिक प्रभाव क्या है?
यह अभियान समाज की सोच में बदलाव लाने और लड़कियों को स्कूल में लाने का प्रयास करता है।
राष्ट्र प्रेस
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