क्या मोदी आर्काइव का 41 साल पुराना संदेश आज भी प्रासंगिक है?
सारांश
Key Takeaways
- युवा मानसिकता उम्र से नहीं, बल्कि दृष्टिकोण से होती है।
- संघर्ष और साहस राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण हैं।
- असली नेतृत्व श्रम में है, विलासिता में नहीं।
- समाज की चुनौतियाँ राष्ट्र की चुनौतियाँ हैं।
- संघर्ष के लिए एकजुट होना आवश्यक है।
नई दिल्ली, 12 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। मोदी आर्काइव ने सोमवार को सभी देशवासियों को राष्ट्रीय युवा दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं दी हैं। इस आर्काइव ने एक्स पोस्ट के माध्यम से जामनगर (गुजरात) में 41 साल पहले आज के ही दिन आयोजित अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के कार्यक्रम का संग्रह प्रस्तुत किया। 12 जनवरी 1985 को 35 वर्षीय युवा संगठनकर्ता नरेंद्र मोदी ने राष्ट्रीय युवा दिवस कार्यक्रम में युवाओं को संबोधित किया था।
उन्होंने कहा था कि जो व्यक्ति अतीत में ही जीता रहता है, वह चाहे कितनी भी उम्र का हो, वृद्ध है। वहीं जो भविष्य के सपनों को पूरा करने के लिए बैचेन है, वही युवा है। युवा होना उम्र का नहीं, बल्कि मानसिकता का सवाल है। युवावस्था का कोई भी क्षण ऐसा नहीं होता, जिसमें भविष्य न छुपा हो। एक भी क्षण ऐसा नहीं होता जो एक बार चला जाए तो अपने निर्धारित कार्य के लिए लौट सके।
जॉन रस्किन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि यदि गर्म लोहे पर चोट नहीं कर पाओगे तो ठंडी लोहे को पीटना पड़ेगा। राष्ट्र का भविष्य हमेशा युवाओं के चरित्र में लिखा जाता है।
तैत्तिरीय उपनिषद और भगवद गीता से प्रेरणा लेते हुए, और पीटर द ग्रेट तथा थॉमस एडिसन जैसे व्यक्तित्वों का उल्लेख करते हुए, नरेंद्र मोदी ने चरित्र, श्रम और सेवा को राष्ट्र निर्माण की सच्ची नींव बताया। उन्होंने कहा कि युवा अच्छे शिक्षित, मजबूत चरित्र वाले और बलवान हैं। ऐसे ईमानदार, मेहनती, आशावादी और दृढ़ युवाओं से ही देश समृद्ध होता है।
35 वर्षीय युवा संगठनकर्ता ने युवा की सच्ची परिभाषा बताते हुए कहा कि युवा वह है जो सुख सुविधाओं के पीछे नहीं दौड़ता, बल्कि साहस का साथ खोजता है और जो परिस्थितियों के आगे हार नहीं मानता। वही सच्चा युवा है। युवा वह है जो आपत्तियों को क्रांति का अवसर बना लेता है।
नरेंद्र मोदी ने कहा कि घोर मध्यरात्रि के अंधकार में भी अरुणोदय की लालिमा देख सके, वही यौवन है। रूसी साम्राज्य के प्रथम सम्राट पीटर द ग्रेट का जिक्र करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा कि 26 साल की आयु में जब जीवन विलासिता से भरा होता है, तब राजवंश के उत्तराधिकारी ने हालैंड की जहाज कंपनी में काम किया और एस्टोनिया में लोहार के यहां लोहे की सलाखें बनाईं। उन्होंने 18 सलाखें बनाईं और 18 स्वर्ण मुद्राओं को ठुकराकर तीन कोपेक मांगे। आज भी रूस के संग्रहालयों में पीटर द ग्रेट की सलाखें सुरक्षित हैं।
इस उदाहरण के माध्यम से नरेंद्र मोदी ने भारत के युवाओं को यह संदेश दिया कि असली नेतृत्व श्रम में है, विलास में नहीं। वहीं थॉमस एडिसन के काम का जिक्र करते हुए नरेंद्र मोदी ने लिखा कि सपना देखना आवश्यक है, लेकिन उसे पूरा करने के लिए पसीना बहाना भी अनिवार्य है। 1985 में दिया गया यह संदेश 2026 में और भी महत्वपूर्ण हो गया है।
इस कार्यक्रम में उन्होंने भारत के युवाओं के सामने मौजूद 17 चुनौतियों की पहचान की और एक मजबूत, आत्मनिर्भर राष्ट्र के निर्माण के लिए एक स्पष्ट रोडमैप प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा था कि चुनौतियों का सामना करनेवाला ही सच्चा युवा है। जो चुनौतियों को ललकारे, वही राष्ट्र की चुनौती का सामना करने वाला तरुण है। समाज के सामने खड़ी चुनौतियां राष्ट्र के सामने खड़ी चुनौतियां हैं।
इतिहास के इस पन्ने पर लिखा है कि मूल्यों का ह्वास, श्रम के प्रति लज्जा, आकांक्षाओं का अभाव, गांवों का विनाश, ब्रेन ड्रेन, भ्रष्टाचार, आधुनिकीकरण का पश्चिमीकरण बनना और आत्मा-अनुशासन, लेकिन समाधान भी उसी पन्ने पर लिखा है। उन्होंने कहा कि अब अकेले नहीं, साथ चलने की जरूरत है। क्रांति और बलिदान की आवश्यकता है। कब तक हाथ पर हाथ धरे बैठे रहेंगे? आज इंसान को इंसान की आवश्यकता है।
1985 में नरेंद्र मोदी ने युवाओं को जो संदेश दिया था, वह चार दशक बाद भी प्रासंगिक है। स्वामी विवेकानंद का संदेश देते हुए मोदी आर्काइव ने लिखा, "आओ, हम सब अपना जीवन उत्सर्ग कर दें, मैं भी और तुम भी, तुम में से प्रत्येक। यह एवं ऐसे ही अनेक कार्य श्रीगणेश मात्र हैं। विश्वास मानो, हमारे जीवन-रक्त की एक-एक बूंद के त्याग से ईश्वर के विराट, वीरचित्त कार्यकर्ता एवं योद्धा जन्म लेंगे, जो संपूर्ण विश्व को क्रांतिमय कर देंगे।"