क्या लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास की भूमिका विश्व युद्ध और 1947 की लड़ाई में अद्वितीय थी?
सारांश
Key Takeaways
- लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास कुमार सिन्हा का जन्म 1926 में हुआ।
- उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध और 1947 की लड़ाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उनका योगदान सेवानिवृत्ति के बाद भी जारी रहा।
- राजनाथ सिंह ने उन्हें श्रद्धांजलि दी।
- उनके सिद्धांतों में अनुशासन और नैतिक स्पष्टता शामिल हैं।
नई दिल्ली, 7 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बुधवार को भारतीय सेना के पूर्व लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास कुमार सिन्हा के महत्वपूर्ण योगदान को याद किया।
1926 में जन्मे ले. जन. सिन्हा के सैन्य करियर के आरंभिक वर्षों को देखते हुए बताया गया कि उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान बर्मा मोर्चे पर कठिन परिस्थितियों में देश का प्रतिनिधित्व किया। जब 1947 में पाकिस्तान समर्थित कबायली हमलावर कश्मीर की ओर बढ़ रहे थे, तब भारतीय सेना की पहली एयरलिफ्ट के समन्वय में भी उन्होंने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्होंने भारतीय और ब्रिटिश स्टाफ कॉलेजों में अपनी उत्कृष्टता और सैन्य बुद्धिमत्ता के लिए विशेष पहचान बनाई।
राजनाथ सिंह ने कहा कि ले. जन. सिन्हा ने डायरेक्टर ऑफ मिलिट्री इंटेलिजेंस, एडजुटेंट जनरल और विभिन्न कमान पदों पर रहते हुए सेना को आधुनिक दृष्टिकोण, संस्थागत मजबूती और पेशेवर क्षमता से सुसज्जित करने का निरंतर प्रयास किया। उन्होंने स्वर्गीय लेफ्टिनेंट जनरल श्रीनिवास कुमार सिन्हा की जन्मशताब्दी के अवसर पर आयोजित स्मृति व्याख्यान में वीडियो संदेश के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि दी।
राजनाथ सिंह ने कहा कि जैसे-जैसे देश अपनी संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर स्पष्ट और दृढ़ नीति के साथ आगे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे ले. जन. एस.के. सिन्हा जैसी महान हस्तियां प्रेरणास्रोत बनी हुई हैं। लेफ्टिनेंट जनरल सिन्हा की राष्ट्र के प्रति अटूट समर्पण, निष्ठा और उत्कृष्ट सेवा को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वह एक महान सैनिक, कुशल राजनयिक और दूरदर्शी प्रशासक थे।
रक्षा मंत्री ने कहा कि ले. जन. सिन्हा का योगदान सेवानिवृत्ति के बाद भी बना रहा। भारत के राजदूत के रूप में उन्होंने नेपाल के साथ भारत के संबंधों को और मजबूत किया। असम एवं जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल के रूप में उन्होंने सुरक्षा, स्थिरता और विकास को प्राथमिकता दी। राजनाथ सिंह ने देशवासियों से आग्रह किया कि भारत को सुरक्षित, आत्मनिर्भर और समृद्ध राष्ट्र बनाने के लिए ले. जन. सिन्हा के आदर्शों से सीखना आवश्यक है। वहीं, चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल अनिल चौहान ने ले. जन. सिन्हा को याद करते हुए कहा कि वह एक सैनिक-राजनेता, विद्वान-योद्धा और चरित्रवान व्यक्तित्व थे।
उन्होंने कहा कि सेना के वरिष्ठ नेतृत्व को पेशेवर सैन्य शिक्षा, वाद-विवाद और ईमानदारी को उतनी ही महत्ता देनी चाहिए जितनी बहादुरी को दी जाती है। उन्होंने मध्यम स्तर के अधिकारियों के लिए मानसिक और शारीरिक दोनों प्रकार के प्रशिक्षण को आवश्यक बताया, जबकि युवा अधिकारियों और जवानों को कठोर परिश्रम, अनुशासन, चिंतन, दृढ़ता और सहानुभूति विकसित करने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि साहस केवल युद्धभूमि पर नहीं, बल्कि नैतिक स्पष्टता और कर्तव्यपालन में भी निहित होता है। सीडीएस ने वर्तमान समय के जटिल और बहुआयामी युद्धक्षेत्र का उल्लेख किया। ये वे क्षेत्र हैं जिनमें साइबर, स्पेस, सूचना और संज्ञानात्मक आयाम शामिल हैं।
उन्होंने कहा कि आज भारत को ऐसे सैनिकों की आवश्यकता है जो न केवल बहादुर हों, बल्कि गहरी सोच और विश्लेषण की क्षमता भी रखते हों, और जो संविधान के मूल्यों को सदैव सर्वोच्च मानें। उन्होंने कहा कि ले. जन. सिन्हा के साहस, जिज्ञासा और संवैधानिक प्रतिबद्धता के सम्मिश्रण से ही वह आदर्श भारतीय सैनिक तैयार होगा, जो न केवल सीमाओं और नागरिकों की रक्षा करेगा, बल्कि भारत के भविष्य को भी आकार देगा। इस अवसर पर पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल एन.सी. विज, जनरल दीपक कपूर और जनरल दलबीर सिंह सहित उप थलसेनाध्यक्ष लेफ्टिनेंट जनरल पी.पी. सिंह भी उपस्थित रहे।