रमजान के 19वें दिन शिया समुदाय ने गिलीम जुलूस का आयोजन किया, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत
सारांश
Key Takeaways
- गिलीम जुलूस शिया समुदाय के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है।
- इसमें 20,000 से अधिक लोग शामिल हुए।
- सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए थे।
- यह जुलूस रमजान के 19वें दिन निकाला जाता है।
- हजरत अली की शहादत की याद में यह आयोजन होता है।
लखनऊ, 9 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। रमजान के 19वें दिन शिया समुदाय ने पारंपरिक 'गिलीम' जुलूस का आयोजन किया। यह ऐतिहासिक जुलूस कूफा मस्जिद से आरंभ होकर इमामबाड़ा तकी जैदी पर समाप्त हुआ। सुरक्षा के सख्त इंतजामों के बीच इस जुलूस में लगभग 20,000 लोग शामिल हुए। कानून-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए 1,500 से अधिक पुलिसकर्मियों की तैनाती की गई थी, साथ ही ड्रोन और छतों पर तैनात सुरक्षाबलों के माध्यम से पूरे मार्ग की निगरानी की गई।
डीसीपी विश्वजीत श्रीवास्तव ने बताया कि यह रमजान के 19वें दिन का जुलूस है, जिसे गिलीम जुलूस के नाम से भी जाना जाता है। यह जुलूस सादातगंज से शुरू होकर चौक और पाटा नाला होते हुए लगभग तीन किलोमीटर की यात्रा पूरी करता है। आमतौर पर इसमें 15,000 से 20,000 लोगों की भीड़ होती है। उन्होंने बताया कि यह शिया समुदाय द्वारा आयोजित एक महत्वपूर्ण जुलूस है।
डीसीपी ने कहा कि हर साल की तरह इस बार भी पुलिस की व्यापक व्यवस्था की गई है। हमें मुख्यालय से और कमिश्नरेट से भी बल मिला है। जोन सेक्टर व्यवस्था के तहत 10 अतिरिक्त एसपी की ड्यूटी लगाई गई है। इसे तीन भागों में बांटा गया है और डिप्टी एसपी स्तर के तीन अधिकारी भी तैनात किए गए हैं। इसके अलावा, 10 कंपनी पीएसी और 2 कंपनी आरएएफ की भी तैनाती की गई है, ताकि जुलूस शांतिपूर्ण तरीके से अपने गंतव्य तक पहुंच सके।
गौरतलब है कि शिया समुदाय में गिलीम जुलूस एक महत्वपूर्ण धार्मिक आयोजन है, जो मुख्य रूप से रमजान के महीने में, विशेषकर 19वीं रमजान को निकाला जाता है। यह जुलूस शिया इमाम हजरत अली इब्ने अबी तालिब (अ.स.) की शहादत की याद में निकाला जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 19 रमजान को जब कूफा की मस्जिद में नमाज के दौरान इब्ने मुलजिम ने हजरत अली पर तलवार से हमला किया था, तब घायल अवस्था में उन्हें जिस 'गिलीम' (कंबल) में रखकर घर लाया गया था, यह जुलूस उसी दृश्य की याद दिलाता है।