क्या मदरसों के खिलाफ गैरकानूनी कार्रवाई बंद होनी चाहिए?

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क्या मदरसों के खिलाफ गैरकानूनी कार्रवाई बंद होनी चाहिए?

सारांश

जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना महमूद असद मदनी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया है। इस फैसले के माध्यम से संविधान की सर्वोच्चता को मान्यता मिली है। जानिए, मौलाना मदनी ने इस मुद्दे पर और क्या कहा है।

मुख्य बातें

हाई कोर्ट का फैसला संविधान की सर्वोच्चता की पुष्टि करता है।
मदरसों के खिलाफ की जा रही कार्रवाई गैरकानूनी है।
अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों की रक्षा की जाएगी।
सरकारों को नीतियों की समीक्षा करनी चाहिए।
मौलाना मदनी का संघर्ष जारी रहेगा।

नई दिल्ली, 19 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हजरत मौलाना महमूद असद मदनी ने इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा स्वतंत्र और गैर-मान्यता प्राप्त (नॉन-अफिलिएटेड) दीनी मदरसों के मामले में दिए गए ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया है। उनका कहना है कि यह निर्णय भारतीय संविधान की सर्वोच्चता और संविधानिक मूल्यों की स्पष्ट विजय है।

मौलाना मदनी ने कहा कि यह फैसला उन सभी सरकारों और प्रशासनिक अधिकारियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है जो दीनी मदरसों और मकतबों को बंद करने जैसे कदमों को अपनी उपलब्धि बताने का प्रयास कर रहे थे। उनके अनुसार, ऐसे कदम न केवल असंवैधानिक हैं, बल्कि अंततः उन्हें शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता है।

उन्होंने यह भी बताया कि जमीयत उलमा-ए-हिंद श्रावस्ती जिले के 30 मदरसों की ओर से इलाहाबाद हाई कोर्ट में पक्षकार रही है और उत्तराखंड सरकार के रवैये के खिलाफ कानूनी और लोकतांत्रिक संघर्ष कर रही है। इस फैसले से इन प्रयासों को मजबूती मिली है। साथ ही, उन्होंने मदरसों के संचालकों से अपील की कि वे अपने आंतरिक प्रबंधन और शैक्षणिक व्यवस्था को बेहतर बनाते रहें, ताकि विरोध करने वालों को कोई बहाना न मिले।

मौलाना मदनी ने कहा कि हाई कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा है कि केवल मान्यता न होने के आधार पर किसी मदरसे को बंद करना, सील करना या उसकी पढ़ाई रोकना कानूनी रूप से गलत है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि उत्तर प्रदेश के मदरसा नियमों में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत प्रशासन गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे को बंद कर सके।

उन्होंने आगे कहा कि हाई कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के उस संवैधानिक सिद्धांत की भी पुष्टि की है जिसके अनुसार वे अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान जो न तो सरकारी सहायता लेते हैं और न ही मान्यता चाहते हैं, उन्हें संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत पूरा संरक्षण प्राप्त है।

मौलाना मदनी ने उत्तर प्रदेश सहित सभी राज्य सरकारों से अपील की कि वे इस फैसले और सुप्रीम कोर्ट के तय संवैधानिक सिद्धांतों के अनुसार अपनी नीतियों की समीक्षा करें और मदरसों के खिलाफ किसी भी प्रकार की मनमानी, गैरकानूनी या भेदभावपूर्ण कार्रवाई से तुरंत बचें।

उन्होंने कहा कि जमीयत उलमा-ए-हिंद संविधान के दायरे में रहते हुए अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक, धार्मिक और नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए अपना संघर्ष जारी रखेगी।

इस अवसर पर मौलाना मदनी ने इस मामले की पैरवी करने वाले वकीलों और पक्षकार मदरसों के धैर्य और कानूनी संघर्ष की सराहना की और उन्हें इस सफलता पर बधाई दी।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि यह एक महत्वपूर्ण संकेत है कि संविधान के भीतर सभी शैक्षणिक संस्थानों को अपने अधिकारों का संरक्षण प्राप्त है। यह एक मजबूत लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है और इससे अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा को मजबूती मिली है।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला क्या है?
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने गैर-मान्यता प्राप्त दीनी मदरसों को बंद करने की कार्रवाई को कानूनी रूप से गलत ठहराया है।
मौलाना महमूद असद मदनी का इस फैसले पर क्या कहना है?
मौलाना मदनी ने इसे भारतीय संविधान की सर्वोच्चता की जीत बताया है।
क्या राज्य सरकारें इस फैसले का पालन करेंगी?
मौलाना मदनी ने सभी राज्य सरकारों से इस फैसले के अनुसार नीतियों की समीक्षा करने की अपील की है।
राष्ट्र प्रेस
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