मद्रास उच्च न्यायालय का आदेश: तमिलनाडु में अधीनम और मठों की संपत्तियों से अतिक्रमण १२ हफ्तों में हटेगा
सारांश
Key Takeaways
- मद्रास उच्च न्यायालय का आदेश धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों की सुरक्षा को लेकर है।
- राज्य सरकार को १२ हफ्तों में अतिक्रमण हटाने का निर्देश दिया गया है।
- यह मामला २०१८ में दायर याचिका से संबंधित है।
- अदालत ने पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई पर जोर दिया है।
- इस निर्णय का प्रभाव राज्य में अतिक्रमण के मामलों के समाधान पर पड़ेगा।
चेन्नई, २५ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। मद्रास उच्च न्यायालय ने तमिलनाडु में अधीनम और मठों की संपत्तियों पर होने वाले अतिक्रमण के मामले को गंभीरता से लेते हुए राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिए हैं।
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा है कि धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों से अवैध कब्जे को १२ हफ्तों के भीतर हटाया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी सुनिश्चित किया कि धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों की सुरक्षा करना सरकार की जिम्मेदारी है, और इस दिशा में किसी भी प्रकार की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी।
यह मामला २०१८ में दायर एक याचिका से संबंधित है। थिरुथोंडर ट्रस्ट के ट्रस्टी, राधाकृष्णन ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, जिसमें आरोप लगाया गया था कि थूथुकुडी जिले के नेदुंगुंद्रम में स्थित सेंगोल अधीनम की संपत्तियों पर अवैध कब्जा किया गया है। उन्होंने अदालत से अनुरोध किया था कि इन अतिक्रमणों को हटाकर संपत्तियां संबंधित धार्मिक संस्था को वापस दी जाएं। सेंगोल अधीनम के पास थूथुकुडी और तिरुनेलवेली जिलों में कई संपत्तियां हैं, जिनमें से कुछ पर कथित तौर पर अवैध कब्जा किया गया था।
याचिका पर सुनवाई करते हुए, उच्च न्यायालय ने पहले निर्देश दिया था कि तमिलनाडु के सभी अधीनम और मठों के प्रमुखों को मामले में पक्षकार बनाया जाए। ताकि राज्यभर में धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों से जुड़े अतिक्रमण के मुद्दे पर व्यापक विचार किया जा सके। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता और त्वरित कार्रवाई आवश्यक है।
मामले की विस्तृत सुनवाई के बाद, जस्टिस एसएम सुब्रमण्यम और जस्टिस सी. कुमारप्पन की डिवीजन बेंच ने तमिलनाडु सरकार को आदेश दिया कि अधीनम और मठों की सभी संपत्तियों से अवैध कब्जे १२ हफ्तों के भीतर हटाए जाएं। अदालत ने उम्मीद जताई कि प्रशासन समय पर कार्रवाई करेगा और संबंधित धार्मिक संस्थाओं के अधिकारों की रक्षा करेगा।
हाई कोर्ट के इस निर्णय को धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियों की सुरक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इससे राज्य में लंबे समय से लंबित अतिक्रमण के मामलों के समाधान की उम्मीद जगी है।