महिला आरक्षण बिल: लोकसभा सीटें बढ़ाकर 850 करने का केंद्र सरकार का प्रस्तावित संशोधन
सारांश
Key Takeaways
- महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य लोकसभा सीटों की संख्या को 850 करना है।
- बिल में 33 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है।
- केंद्र शासित प्रदेशों के लिए 35 से अधिक सदस्यों का प्रतिनिधित्व नहीं होगा।
- आबादी की परिभाषा में बदलाव किया गया है।
- 16 अप्रैल से विशेष संसद सत्र बुलाया गया है।
नई दिल्ली, 14 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। केंद्र सरकार ने मंगलवार को सांसदों के साथ संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, 2026 का मसौदा प्रस्तुत किया। यह महिला आरक्षण विधेयक में प्रस्तावित संशोधन है, जिसका मुख्य उद्देश्य लोकसभा सीटों की संख्या को बढ़ाकर 850 करना है, जिसमें राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि शामिल होंगे।
यह विधेयक राज्यों के निर्वाचन क्षेत्रों से सीधे चुने जाने वाले सदस्यों की संख्या को 815 की सीमा तक बढ़ाने का प्रस्ताव करता है।
केंद्र शासित प्रदेशों (यूटी) के लिए विधेयक में उल्लेख है, "केंद्र शासित प्रदेशों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों की संख्या 35 से अधिक नहीं होगी, और उनका चुनाव उस तरीके से किया जाएगा जैसा कि संसद कानून द्वारा निर्धारित करेगा।"
वर्तमान में, राज्यों से लोकसभा के 530 सदस्य और केंद्र शासित प्रदेशों से 20 सदस्य हैं। यह संख्या 543 निर्धारित की गई थी एक परिसीमन आयोग द्वारा।
विधेयक में एक महत्वपूर्ण बदलाव आबादी की परिभाषा को लेकर है, जो संसद को यह अधिकार देता है कि वह यह तय करे कि सीटों की संख्या बढ़ाने के लिए किस डेटा का उपयोग किया जाएगा।
संविधान के आर्टिकल 81 के क्लॉज (3) में संशोधन के लिए विधेयक यह प्रस्ताव करता है, "(3) इस आर्टिकल में 'आबादी' का मतलब ऐसी जनगणना में पता लगाई गई जनसंख्या है, जिसे संसद कानून बनाकर तय कर सकती है और जिसके जरूरी आंकड़े प्रकाशित हो चुके हैं।"
हाल ही में, केंद्रीय मंत्रिमंडल ने उस विधेयक को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण को जल्द से जल्द लागू करना है। इसके साथ ही, यह संसद के निचले सदन में सीटों की संख्या बढ़ाने का भी प्रस्ताव रखता है।
संशोधन विधेयक अनुच्छेद 82 में भी परिवर्तन का प्रस्ताव करता है, जिसके तहत "प्रत्येक जनगणना के पूरा होने पर, सीटों का आवंटन" के स्थान पर "सीटों का आवंटन" शब्द रखे जाएंगे।
प्रस्तावित संशोधन का उद्देश्य कोटे के कार्यान्वयन को 2027 की जनगणना से अलग करना और इसके बजाय इसे 2011 की जनगणना पर आधारित करना है, ताकि 2029 के आम चुनावों से पहले इसे लागू किया जा सके।
अनुच्छेद 82 में संशोधन विधेयक परिसीमन आयोग की भूमिका को भी शामिल करने का प्रस्ताव करता है।
यह विधेयक लोकसभा और विधानसभाओं में रोटेशन के आधार पर सीटों के आरक्षण की भी चर्चा करता है और इसमें उन अवधियों से संबंधित अनुच्छेद भी शामिल हैं, जिनके लिए महिलाओं का आरक्षण लागू रहेगा, बशर्ते संसद द्वारा इसे आगे बढ़ाया जाए।
इससे पहले, केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरन रिजिजू ने कहा था कि महिला आरक्षण विधेयक में प्रस्तावित संशोधन में कुछ भी विवादित नहीं है। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि वे इस मुद्दे का राजनीतिकरण किए बिना इसका समर्थन करें।
राष्ट्र प्रेस से बात करते हुए रिजिजू ने कहा कि महिला आरक्षण किसी भी रूप में राजनीतिक मुद्दा नहीं बनाया जा सकता। अगर हम इसे राजनीतिक रंग देते हैं, तो यह महिलाओं के साथ अन्याय होगा। प्रधानमंत्री ने दलीय राजनीति से ऊपर उठने की बहुत ही सरल और स्पष्ट अपील की है। नारी शक्ति अधिनियम (महिला आरक्षण कानून) एक ऐसा कानून है, जिसका सभी दलों ने समर्थन किया और जिसे सर्वसम्मति से पारित किया। अब, हमने इसे लागू करने के लिए संसद का विशेष सत्र बुलाया है।
गौरतलब है कि सरकार ने नारी शक्ति वंदन अधिनियम पर चर्चा करने और उसे पारित करने के लिए 16 अप्रैल से तीन दिवसीय विशेष संसद सत्र बुलाया है।
बीजेपी ने लोकसभा और राज्यसभा में अपने सभी सांसदों के लिए तीन-लाइन का व्हिप जारी किया है, जिसमें उन्हें आगामी संसद सत्र के दौरान 16 से 18 अप्रैल तक सदन में उपस्थित रहने का निर्देश दिया गया है।