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महिला मतदाता: 2024 के चुनावों के बाद भारतीय राजनीति की नई धुरी

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महिला मतदाता: 2024 के चुनावों के बाद भारतीय राजनीति की नई धुरी

सारांश

2024 के बाद भारतीय राजनीति में महिला मतदाताओं का प्रभाव बढ़ा है। यह बदलाव न केवल चुनावी रणनीतियों में दिखता है, बल्कि महिला सशक्तीकरण की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है। जानिए कैसे महिलाएं अब 'किंगमेकर' बन चुकी हैं।

मुख्य बातें

महिला मतदाता अब चुनावों में निर्णायक भूमिका निभा रही हैं।
महिला केंद्रित योजनाएं उनकी भागीदारी बढ़ाने में सहायक हैं।
महिला आरक्षण बिल का प्रस्ताव भारतीय राजनीति में महिलाओं की स्थिति को मजबूत करेगा।
राजनीतिक दल अब महिलाओं को ध्यान में रखकर घोषणापत्र तैयार कर रहे हैं।
महिलाओं का आर्थिक सशक्तीकरण उनके मतदान में वृद्धि का प्रमुख कारण है।

नई दिल्ली, 9 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। यह कहा जाता है कि हर एक दशक और आधे दशक में हर क्षेत्र में महत्वपूर्ण बदलाव देखने को मिलते हैं, चाहे वह तकनीकी हो या राजनीतिक। 2024 के आम चुनावों के बाद भारत के राजनीतिक परिदृश्य पर महिला मतदाताओं की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, और यह आंकड़ा हर विधानसभा चुनाव में लगातार बढ़ता जा रहा है।

भारतीय राजनीति में 'आधी आबादी' अब केवल चुनाव प्रचार का हिस्सा नहीं रह गई है, बल्कि यह अब 'किंगमेकर' बन चुकी है, जिसके चारों ओर हर राजनीतिक दल का चुनावी घोषणापत्र तैयार हो रहा है। 2024 से पहले, राजनीतिक पार्टियाँ केवल युवाओं पर ध्यान केंद्रित करती थीं, लेकिन अब उन्होंने महिलाओं को भी अपनी नीतियों में शामिल करना शुरू कर दिया है। महिलाओं के लिए कई योजनाओं को लागू किया गया है, जिसका नतीजा यह है कि हर चुनाव में महिला मतदाताओं की संख्या बढ़ती हुई देखी गई है।

चुनाव आयोग और एसबीआई रिसर्च विभाग के हालिया आंकड़े बताते हैं कि महिला वोटरों की भागीदारी अब तक के उच्चतम स्तर पर पहुँच गई है, और इसके पीछे सरकार की 'महिला-केंद्रित' कल्याणकारी योजनाओं का बड़ा योगदान है।

2024 के लोकसभा चुनावों में एक ऐतिहासिक रिकॉर्ड बना, जब महिला मतदाताओं का टर्नआउट (65.78 प्रतिशत) पुरुष मतदाताओं (65.55 प्रतिशत) से अधिक हो गया। इस चुनाव में लगभग 31.2 करोड़ महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया, जो इतिहास में एक नया मील का पत्थर है।

यह लहर केवल लोकसभा तक सीमित नहीं रही। 2024 में हुए विधानसभा चुनावों में इस ट्रेंड ने और भी मजबूती से पकड़ बनाई। झारखंड विधानसभा चुनाव (2024) के आंकड़ों के अनुसार, पहले चरण में ही 69.04 प्रतिशत महिलाओं ने मतदान किया, जबकि पुरुषों का प्रतिशत केवल 64.27 प्रतिशत रहा। 43 में से 37 सीटों पर महिलाओं का टर्नआउट पुरुषों से अधिक था।

महाराष्ट्र और हरियाणा जैसे राज्यों में भी महिलाओं ने जोरदार भागीदारी दिखाई। जहाँ महिलाओं के लिए सीधी नकद हस्तांतरण योजनाएं लागू थीं, वहाँ महिला मतदान प्रतिशत में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई।

2025 के अंत में बिहार विधानसभा चुनावों में भी यही ट्रेंड देखने को मिला। यहाँ बिहार सरकार की 'मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना' ने काफी प्रभाव डाला। इस योजना के तहत रोजगार शुरू करने के लिए 10,000 रुपये की सहायता राशि दी गई। इस योजना के अंतर्गत कुछ मामलों में बेहतर प्रदर्शन पर 2 लाख रुपये तक की सहायता राशि प्रदान करने का प्रावधान है। इसका परिणाम यह हुआ कि बिहार में भी महिलाओं ने रिकॉर्डतोड़ मतदान किया, जहाँ महिलाओं का मतदान प्रतिशत 71.6 और पुरुषों का 62.8 रहा।

अब यही ट्रेंड 9 अप्रैल को हो रहे विधानसभा चुनावों में भी देखने को मिल रहा है। चाहे असम चुनाव हो, केरल या पुडुचेरी, हर जगह महिला मतदाताओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक है।

एसबीआई की जनवरी 2025 की विस्तृत रिसर्च रिपोर्ट के अनुसार, 2019 की तुलना में 2024 और उसके बाद के चुनावों में महिलाओं के मतदान प्रतिशत में बढ़ोतरी कोई संयोग नहीं है। इसके पीछे जमीनी स्तर पर कार्यरत सरकारी योजनाएं हैं।

राज्यों में 'माझी लड़की बहिण योजना' (महाराष्ट्र) या 'मंईयां सम्मान योजना' (झारखंड) जैसी योजनाओं ने महिलाओं के हाथ में सीधे पैसा पहुँचाया है। जब महिलाओं को बिना किसी बिचौलिए या परिवार के पुरुष सदस्य पर निर्भर हुए सीधे आर्थिक मदद मिलती है, तो उनका सत्ता के प्रति विश्वास बढ़ता है और वे मतदान करने के लिए और प्रेरित होती हैं।

बढ़ी हुई महिला वोटिंग में एक बड़ा हिस्सा उन महिलाओं का है, जिन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत घरों का मालिकाना हक मिला है। संपत्ति पर नाम होने से महिलाओं में सामाजिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता की भावना विकसित हुई है।

स्वच्छ भारत अभियान के तहत बने शौचालय और 'हर घर जल' योजना ने महिलाओं के जीवन की सबसे बड़ी चुनौतियों को कम किया है। घर में नल और बिजली जैसी सुविधाएं उनके जीवन स्तर को सुधारा है, जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव पोलिंग बूथ पर उनके बढ़े हुए टर्नआउट के रूप में सामने आया है।

स्वयं सहायता समूहों की मजबूती और मुद्रा योजना के तहत आसान लोन मिलने से लाखों महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हुई हैं। लगभग 36 लाख अतिरिक्त महिला वोटर इसी श्रेणी से जुड़ी पाई गई हैं।

इस डेटा ने राजनीतिक दलों को स्पष्ट संदेश दिया है कि अब चुनाव जाति या धर्म के पुराने समीकरणों से नहीं, बल्कि 'जेंडर पॉलिटिक्स' के माध्यम से जीते जा रहे हैं। अब हर पार्टी यह समझ चुकी है कि महिला वोटर एक स्वतंत्र वोट बैंक हैं। वे अब अपने पति या पिता के कहने पर वोट नहीं देतीं, बल्कि उस पार्टी को चुनती हैं जो उनकी सुरक्षा, सम्मान और रसोई के बजट को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती है।

2024 और उसके बाद के चुनाव इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि भारतीय लोकतंत्र में अब नीतियां महिलाओं को ध्यान में रखकर ही बनाई जाएंगी। इसका ताजा उदाहरण महिला आरक्षण बिल भी है, जो आने वाले समय में संसद में पेश किया जाएगा। इसके तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत तक का आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है।

सरकार की महिला-केंद्रित योजनाओं ने न केवल उन्हें आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त किया है, बल्कि उन्हें भारतीय लोकतंत्र की सबसे मजबूत और निर्णायक आवाज भी बना दिया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि समाज में महिलाओं की स्थिति में सुधार की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम है।
RashtraPress
10 अगस्त 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

महिला मतदाताओं की भागीदारी में वृद्धि का मुख्य कारण क्या है?
महिला केंद्रित योजनाओं और आर्थिक सशक्तीकरण के कारण महिला मतदाता अब अधिक सक्रिय हो रही हैं।
क्या महिला मतदाता चुनावी परिणामों पर प्रभाव डाल सकती हैं?
हां, महिला मतदाता अब 'किंगमेकर' बन चुकी हैं और चुनावी परिणामों को प्रभावित कर रही हैं।
महिला आरक्षण बिल क्या है?
महिला आरक्षण बिल के तहत महिलाओं को 33 प्रतिशत तक का आरक्षण देने का प्रावधान किया गया है।
महिला मतदाताओं की बढ़ती संख्या से राजनीतिक दलों पर क्या असर पड़ा है?
राजनीतिक दल अब महिलाओं को ध्यान में रखकर अपने घोषणापत्र तैयार कर रहे हैं।
महिला-केंद्रित योजनाओं का क्या प्रभाव है?
इन योजनाओं ने महिलाओं को आर्थिक और सामाजिक रूप से सशक्त किया है।
राष्ट्र प्रेस
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