क्या मुनि तरुण सागर का जीवन एक अद्वितीय प्रेरणा है?

Key Takeaways
- मुनि तरुण सागर ने 13 वर्ष की आयु में संन्यास लिया।
- वे 33 वर्ष में दिल्ली के लालकिले से बोले।
- उन्होंने समाज के विभिन्न मुद्दों पर खुलकर बात की।
- उनकी 36 से अधिक पुस्तकें हैं।
- उन्होंने 1 सितंबर 2018 को देह त्याग किया।
नई दिल्ली, 31 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। समाज सुधार, आध्यात्मिक परिवर्तन और निर्भीक वक्तृत्व की चर्चा में जैन धर्म की दिगंबर परंपरा के अद्वितीय संत मुनि तरुण सागर जी महाराज का नाम सबसे पहले आता है। 26 जून 1967 को मध्यप्रदेश के दमोह जिले के गहंची गांव में पवन कुमार जैन के रूप में जन्मे तरुण सागर ने केवल 13 वर्ष की आयु में संन्यास लेने का निर्णय लिया। यही निर्णय उन्हें न केवल जैन समाज का, बल्कि समग्र भारत का राष्ट्रसंत बना गया।
उन्होंने 13 वर्ष की आयु में दीक्षा ली और 20 जुलाई 1988 को दिगंबर मुनि दीक्षा धारण की। इस आयु में अधिकांश बच्चे किशोरावस्था में होते हैं, जबकि तरुण सागर ने अपने जीवन को तप और साधना की ओर समर्पित कर दिया। केवल 33 वर्ष की आयु में उन्होंने दिल्ली के ऐतिहासिक लालकिले पर राष्ट्र को संबोधित करके इतिहास रच दिया। यह पहला अवसर था जब किसी मुनि ने लालकिले से अपनी वाणी का अमृत फैलाया। उनके प्रवचनों का प्रभाव इस बात से स्पष्ट है कि 122 देशों में टीवी के माध्यम से उनकी वाणी का सीधा प्रसारण किया गया।
तरुण सागर का नाम सुनते ही उनके कड़वे प्रवचन याद आते हैं। उनकी वाणी में कटुता नहीं, बल्कि समाज की कमियों पर प्रहार था। भ्रष्टाचार, पाखंड, नशा, दहेज और राजनीतिक स्वार्थ पर उन्होंने खुलकर बात की। यही कारण था कि उनके प्रवचन न केवल जैन समाज, बल्कि हर धर्म और वर्ग के लोगों को झकझोर देते थे। उनकी वाणी सरल थी, लेकिन उसमें गहराई थी।
वे कहा करते थे कि सत्य कड़वा होता है, पर वही जीवन को सही दिशा देता है। इसी दृष्टिकोण से उनके प्रवचनों का संग्रह लाखों प्रतियों में प्रकाशित हुआ और आज भी घर-घर में पढ़ा जाता है।
तरुण सागर केवल एक संत नहीं थे, बल्कि एक गहन चिंतक भी थे। उन्होंने परिवार से लेकर राजनीति तक हर मुद्दे पर आवाज उठाई। उनकी शैली व्यंग्यपूर्ण थी, लेकिन उसमें व्यावहारिक समाधान भी होते थे।
उन्होंने कहा कि धर्म केवल मंदिर की दीवारों तक सीमित न रहे, बल्कि वह परिवार और समाज के हर कोने में जिए। यही कारण है कि जैन समाज के बाहर भी उन्हें अपार लोकप्रियता मिली। देश के प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति से लेकर आम नागरिक तक उनकी वाणी से प्रभावित हुए।
इस संत ने 35 वर्ष की आयु में राष्ट्रसंत की उपाधि प्राप्त की। 37 वर्ष की आयु में उन्होंने गुरु मंत्र दीक्षा की परंपरा शुरू कर लाखों अनुयायियों को प्रेरित किया। वे पहले संत बने जिन्होंने भारतीय सेना और राजभवन जैसे प्रतिष्ठित मंचों से संबोधन किया, जो उनकी व्यापक स्वीकार्यता और प्रभाव को दर्शाता है। इसके अलावा, उन्होंने 36 से अधिक पुस्तकें लिखीं, जिनकी 10 लाख से अधिक प्रतियां बिक चुकी हैं।
उन्होंने 1 सितंबर 2018 को दिल्ली स्थित राधापुरी जैन मंदिर में देह त्याग दिया। उनके निधन से न केवल जैन समाज, बल्कि पूरे भारत ने एक आध्यात्मिक मार्गदर्शक खो दिया। उनकी विरासत आज भी जीवित है।