सुरक्षा बलों की रणनीतियों से नक्सलवाद और कश्मीर में उग्रवाद में कमी

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सुरक्षा बलों की रणनीतियों से नक्सलवाद और कश्मीर में उग्रवाद में कमी

सारांश

भारत में वामपंथी उग्रवाद और जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद में कमी आई है। सुरक्षा बलों की रणनीतियों और विकास आधारित हस्तक्षेपों ने इस गिरावट में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। जानें कैसे इन उपायों ने स्थिरता को बढ़ावा दिया।

Key Takeaways

  • नक्सलवाद और कश्मीर में उग्रवाद में कमी आई है।
  • सुरक्षा बलों की रणनीतियों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
  • विकास आधारित हस्तक्षेपों ने माओवादी संगठनों का आधार कमजोर किया है।
  • जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद विरोधी अभियान अधिक प्रभावी हुए हैं।
  • स्थिरता और सुधार के संकेत मिल रहे हैं, लेकिन खतरे अभी भी बने हुए हैं।

नई दिल्ली, 5 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत में पिछले 12 वर्षों में दो प्रमुख आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों—वामपंथी उग्रवाद और जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद में महत्वपूर्ण कमी देखी गई है। लगातार सुरक्षा अभियानों, बेहतर खुफिया समन्वय और विकास आधारित हस्तक्षेपों ने इस गिरावट में निर्णायक भूमिका निभाई है।

द संडे गार्जियन में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा गया है कि नक्सलवाद के क्षेत्र में माओवादी समूहों के भौगोलिक विस्तार और परिचालन क्षमताओं में भारी कमी आई है।

रिपोर्ट के अनुसार, नक्सलवाद के मोर्चे पर माओवादी संगठनों की भौगोलिक उपस्थिति और ऑपरेशनल क्षमता में तेज गिरावट आई है। पहले मध्य और पूर्वी भारत के बड़े हिस्से में फैला रेड कॉरिडोर अब कुछ जिलों में सीमित रह गया है।

सुरक्षाबलों ने वर्षों में कई प्रमुख माओवादी नेताओं को निष्क्रिय किया, उनके लॉजिस्टिक नेटवर्क को तोड़ा और सप्लाई लाइनों को बाधित किया, जिससे उनकी गतिविधियों पर बड़ा असर पड़ा। रणनीति में बदलाव और इलाके पर कब्जे के बजाय खुफिया आधारित टारगेटेड ऑपरेशंस ने इस सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

तकनीक के बढ़ते उपयोग, राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों का बेहतर समन्वय और दूरदराज क्षेत्रों में मजबूत सुरक्षा कैंप स्थापित करने से माओवादी कैडर की गतिशीलता और हमले की क्षमता काफी कम हो गई है।

सरकार द्वारा नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास पर जोर भी निर्णायक साबित हुआ है। सड़क, मोबाइल कनेक्टिविटी, बैंकिंग और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार से दूरदराज के आदिवासी इलाकों का मुख्यधारा से जुड़ाव बढ़ा है, जिससे माओवादी संगठनों का आधार कमजोर हुआ है। आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियों ने भी कई कैडरों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित किया है।

इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर में भी पिछले दशक में उग्रवाद में कमी आई है। सेना, अर्धसैनिक बलों और स्थानीय पुलिस के बीच बेहतर समन्वय से आतंकवाद विरोधी अभियान अधिक प्रभावी और सटीक हुए हैं।

रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि आतंक के पूरे इकोसिस्टम, ओवरग्राउंड वर्कर नेटवर्क, फंडिंग चैनल और भर्ती तंत्र को तोड़ने पर विशेष ध्यान दिया गया है। निगरानी और कार्रवाई बढ़ने से आतंकी संगठनों के लिए संचालन और नए सदस्यों को जोड़ना कठिन हो गया है। सीमा प्रबंधन, फेंसिंग और आधुनिक निगरानी तकनीकों के कारण घुसपैठ में भी काफी कमी आई है, जिससे पाकिस्तान समर्थित समूहों की क्षमता प्रभावित हुई है।

हालांकि पहले स्थानीय भर्ती चिंता का विषय थी, लेकिन लगातार दबाव और जनसंपर्क पहल के चलते इसमें भी गिरावट आई है। टारगेटेड ऑपरेशंस ने सक्रिय आतंकियों की लाइफस्पैन कम कर दी है, जिससे उनके हमलों की क्षमता सीमित हुई है।

इन सभी उपायों के संयुक्त प्रभाव से बड़े हमलों में कमी आई है और क्षेत्र में स्थिरता बढ़ी है। नागरिक जीवन, पर्यटन और स्थानीय प्रशासन में सुधार के संकेत मिले हैं, हालांकि रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि छिटपुट घटनाएं और खतरे अब भी बने हुए हैं।

अभिनंदन मिश्रा द्वारा तैयार रिपोर्ट के मुताबिक सख्त सुरक्षा उपायों के साथ विकास और सुशासन को जोड़ने वाली रणनीति ने नक्सलवाद और कश्मीर में उग्रवाद दोनों में गिरावट लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

Point of View

लेकिन सतर्कता बनाए रखना आवश्यक है।
NationPress
13/04/2026

Frequently Asked Questions

नक्सलवाद में कमी के मुख्य कारण क्या हैं?
सुरक्षा अभियानों, बेहतर खुफिया समन्वय और विकास आधारित हस्तक्षेपों ने नक्सलवाद में कमी लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
जम्मू-कश्मीर में उग्रवाद कमजोर क्यों हुआ है?
सेना, अर्धसैनिक बलों और स्थानीय पुलिस के बेहतर समन्वय के कारण आतंकवाद विरोधी अभियान अधिक प्रभावी हुए हैं।
क्या नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में विकास का कोई असर हुआ है?
हाँ, विकास योजनाओं ने आदिवासी इलाकों को मुख्यधारा से जोड़ा है, जिससे माओवादी संगठनों का आधार कमजोर हुआ है।
आतंकवाद की चुनौतियाँ अभी भी बनी हुई हैं?
हालांकि बड़ी घटनाओं में कमी आई है, लेकिन छिटपुट घटनाएं और खतरे अब भी मौजूद हैं।
सरकार की कौन सी नीतियाँ प्रभावी रही हैं?
आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीतियाँ कई कैडरों को हथियार छोड़ने के लिए प्रेरित कर रही हैं।
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