दत्तात्रेय होसबोले: प्रवासी भारतीयों को मेजबान देशों की सेवा करनी चाहिए

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दत्तात्रेय होसबोले: प्रवासी भारतीयों को मेजबान देशों की सेवा करनी चाहिए

सारांश

दत्तात्रेय होसबोले ने प्रवासी भारतीयों को अपने मेजबान देशों के प्रति निष्ठा और भारतीय संस्कृति के प्रति जुड़ाव को महत्व देने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि यह जिम्मेदारी उन्हें जिम्मेदार नागरिक बनाती है।

Key Takeaways

  • प्रवासी भारतीयों को अपने मेजबान देशों के प्रति निष्ठा रखनी चाहिए।
  • सांस्कृतिक पहचान बनाए रखना आवश्यक है।
  • आरएसएस की गतिविधियाँ स्थानीय समाज में समरसता पर केंद्रित हैं।
  • 'वसुधैव कुटुम्बकम' का सिद्धांत सहयोग को बढ़ावा देता है।
  • धार्मिक कट्टरता मानवता के लिए खतरा है।

स्टैनफोर्ड, १८ अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) ने प्रवासी भारतीयों (डायस्पोरा) के लिए एक स्पष्ट दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि विदेशों में निवास करने वाले भारतीयों को सबसे पहले उस देश के प्रति निष्ठा रखनी चाहिए, जहाँ वे निवास कर रहे हैं। लेकिन, साथ ही उन्हें अपनी भारतीय सांस्कृतिक जड़ों से भी जुड़े रहना आवश्यक है।

संघ के १०० वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में दिए गए एक इंटरव्यू में दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि आरएसएस की विदेश में गतिविधियाँ दो मुख्य सिद्धांतों पर आधारित हैं, जिनमें स्थानीय समाज में समरसता और भारत से सांस्कृतिक जुड़ाव बनाए रखना शामिल है।

उन्होंने कहा, "दुनिया के विभिन्न देशों में रहने वाले स्वयंसेवक वहाँ के हिन्दू समाज को संगठित करने का प्रयास करते हैं। उनके कार्य केवल समुदाय तक सीमित नहीं होते, बल्कि वे व्यापक समाज के लिए भी योगदान करते हैं।"

दत्तात्रेय होसबोले ने स्पष्ट किया कि प्रवासी भारतीयों की पहली जिम्मेदारी उनके निवास देश के प्रति होनी चाहिए। उन्होंने कहा, "जिस देश में वे निवास करते हैं, उस देश के प्रति निष्ठा, वफादारी और उसके विकास में योगदान देना प्राथमिकता होनी चाहिए।"

उन्होंने कहा कि यह दृष्टिकोण यह सुनिश्चित करता है कि प्रवासी भारतीय अपने अपनाए गए देशों में जिम्मेदार नागरिक बनें, जबकि अपनी सांस्कृतिक पहचान भी बनाए रखें। सांस्कृतिक जुड़ाव के कारण वे भारत से भी जुड़े रहते हैं और दूर रहते हुए भी भारत की सेवा करते हैं।

दत्तात्रेय होसबोले ने इस विचार को 'वसुधैव कुटुम्बकम', अर्थात् 'पूरी दुनिया एक परिवार है' के सिद्धांत से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यह विचार आरएसएस की सोच का मूल हिस्सा है। यह केवल एक नारा नहीं है, बल्कि इसे व्यवहार में भी लाया जाता है।

उनके अनुसार, यह दर्शन लोगों को पूरी दुनिया को एक परिवार के रूप में देखने के लिए प्रेरित करता है, जिससे टकराव कम होता है और सहयोग की भावना बढ़ती है।

उन्होंने भारत के हालिया वैश्विक संदेश (वन अर्थ, वन फैमिली, वन फ्यूचर) का भी उल्लेख किया और कहा कि यह भी इसी सांस्कृतिक सोच को दर्शाता है।

वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर बात करते हुए दत्तात्रेय होसबोले ने कहा कि आज दुनिया अनेक गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। उन्होंने वर्चस्व की राजनीति, धर्म के नाम पर हिंसा और पर्यावरण संकट को मुख्य समस्याएं बताया।

उन्होंने चेतावनी दी कि धार्मिक कट्टरता आज भी मानवता के लिए एक बड़ा खतरा है। धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा मानवता के लिए संकट है।

दत्तात्रेय होसबोले ने कहा, "यदि परिवार मजबूत होंगे, तो समाज मजबूत होगा, और देश भी मजबूत होगा।" उन्होंने 'प्रेम और स्नेह' को स्वस्थ समाज की नींव बताया।

उन्होंने कहा कि ये सभी समस्याएं आपस में जुड़ी हुई हैं और उनका समाधान केवल सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों के आधार पर संभव है। होसबोले ने कहा, "विविधता है, लेकिन सार्वभौमिक एकता को व्यवहार में लाना आवश्यक है।"

पर्यावरण के मुद्दे पर भी उन्होंने संतुलन की आवश्यकता बताई और कहा कि विज्ञान और तकनीक का विकास आवश्यक है, लेकिन यह पर्यावरण संतुलन की कीमत पर नहीं होना चाहिए।

आरएसएस की भूमिका पर चर्चा करते हुए होसबोले ने कहा कि 'संघ मानव सामाजिक पूंजी' के निर्माण पर ध्यान केंद्रित कर रहा है, जिसमें सांस्कृतिक मूल्य और संगठनात्मक अनुशासन दोनों शामिल हैं।

उन्होंने कहा, 'आरएसएस एक संगठन है, एक आंदोलन है और एक जीवनशैली भी है।' दत्तात्रेय होसबोले ने संकेत दिया कि इस मॉडल को दुनिया के विभिन्न हिस्सों में अपनाया जा सकता है।

हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संघ अन्य देशों में अपने ढांचे को लागू करने का प्रयास नहीं करता, बल्कि वहाँ की परिस्थितियों के अनुसार सिद्धांतों को अपनाने पर जोर देता है। हम चाहते हैं कि हर देश में वहां के समाज के विकास के लिए ये मूल्य काम करें।

दत्तात्रेय होसबोले ने आरएसएस की अंतरराष्ट्रीय भूमिका को लेकर फैली गलतफहमियों को भी दूर करने का प्रयास किया और कहा कि संघ किसी देश की राष्ट्रीय पहचान या राजनीतिक व्यवस्था को प्रभावित नहीं करना चाहता।

धर्मों के बीच संबंधों पर बोलते हुए उन्होंने धार्मिक नेताओं से अपील की कि वे संकीर्ण सोच से बाहर निकलें और आध्यात्मिकता के व्यापक सिद्धांतों को अपनाएं। होसबोले ने कहा, "धर्म और आध्यात्मिकता अलग हैं। आध्यात्मिकता धर्म से ऊपर है।"

उन्होंने कहा कि हर धर्म की अपनी सभ्यतागत जड़ें होती हैं और यदि इन्हें समझा जाए, तो मानवता के बीच एकता बढ़ सकती है। यदि सभ्यतागत जड़ों को समझा जाए, तो मानव एकता आसान हो जाएगी।

भारत के संदर्भ में उन्होंने कहा कि सभी को अपने धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता है, लेकिन देश के प्रति निष्ठा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। हर किसी को अपने विश्वास की आजादी है, लेकिन राष्ट्र के प्रति वफादारी भी आवश्यक है।

यह बयान ऐसे समय में आया है जब भारतीय मूल के लोग संयुक्त राज्य, यूनाइटेड किंगडम और खाड़ी देशों में राजनीति, व्यापार और शिक्षा के क्षेत्र में तेजी से प्रभावशाली भूमिका निभा रहे हैं।

Point of View

साथ ही अपनी सांस्कृतिक पहचान को भी बनाए रखना चाहिए। यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर सहिष्णुता और सहयोग को बढ़ावा देता है।
NationPress
21/04/2026

Frequently Asked Questions

दत्तात्रेय होसबोले का प्रवासी भारतीयों के प्रति क्या संदेश है?
वे प्रवासी भारतीयों से अपील करते हैं कि वे अपने मेजबान देशों के प्रति निष्ठा रखें और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़े रहें।
आरएसएस की विदेश में गतिविधियों का मुख्य उद्देश्य क्या है?
आरएसएस की विदेश में गतिविधियाँ स्थानीय समाज में समरसता और भारत से सांस्कृतिक जुड़ाव बनाए रखने पर आधारित हैं।
'वसुधैव कुटुम्बकम' का क्या अर्थ है?
'वसुधैव कुटुम्बकम' का अर्थ है 'पूरी दुनिया एक परिवार है', जो आरएसएस की सोच का मूल हिस्सा है।
दत्तात्रेय होसबोले ने किन चुनौतियों का उल्लेख किया?
उन्होंने वर्चस्व की राजनीति, धर्म के नाम पर हिंसा और पर्यावरण संकट को प्रमुख समस्याएं बताया।
धार्मिक कट्टरता के बारे में होसबोले का क्या कहना है?
उन्होंने चेतावनी दी कि धार्मिक कट्टरता आज भी मानवता के लिए बड़ा खतरा है।
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