क्या जेएनयू में नारेबाजी के मुद्दे पर पप्पू यादव का क्या कहना है?
सारांश
मुख्य बातें
नई दिल्ली, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली दंगों से जुड़े मामलों में शरजील इमाम और उमर खालिद की जमानत याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज किए जाने पर सांसद पप्पू यादव ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि किसी भी मामले में जमानत मिलने का निर्णय इस बात पर निर्भर करता है कि सरकार असहमति को किस तरह से देखती है और एजेंसी अदालत के सामने तथ्यों को कैसे प्रस्तुत करती है।
पप्पू यादव ने राष्ट्र प्रेस से कहा कि इससे पहले भी देश में ऐसे कई उदाहरण रहे हैं, जैसे गोरखपुर या मालेगांव से जुड़े मामले, जहां सरकारों की मंशा लोगों को रिहा कराने की रही है और उसी दिशा में कदम उठाए गए। उन्होंने संकेत दिया कि जब सरकार चाहती है, तो प्रक्रिया अलग तरीके से आगे बढ़ती है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि यदि लंबे समय तक मुकदमा चलने के बाद किसी व्यक्ति को सजा नहीं होती, तो उसके जीवन का कीमती समय कौन लौटाएगा।
पप्पू यादव ने कहा कि किसी व्यक्ति के गोल्डन साल जेल में बीत जाएं और बाद में वह निर्दोष साबित हो, तो इसका कोई मुआवजा नहीं हो सकता। उनके अनुसार, इस गंभीर मुद्दे पर समाज और राजनीति में कोई ठोस चर्चा नहीं हो रही है।
जेएनयू में हुई नारेबाजी पर बोलते हुए सांसद पप्पू यादव ने कहा कि उन्हें समझ नहीं आता कि यह सिलसिला बार-बार क्यों चलता रहता है। वैचारिक विरोध लोकतंत्र का हिस्सा है और यह हमेशा बना रहेगा। कभी कोई किसी को अपशब्द कह देता है, कभी विपक्ष को गालियां दी जाती हैं, तो कभी सत्ता पक्ष विपक्ष पर हमले करता है। उनके अनुसार, यह वैचारिक टकराव चलता रहेगा और इसे पूरी तरह खत्म नहीं किया जा सकता।
उन्होंने कहा कि आवाज उठाना जरूरी है, संघर्ष भी जरूरी है, लेकिन यह सब मर्यादा में रहकर होना चाहिए। मर्यादा लांघने या स्तरहीन भाषा का उपयोग करने से लोकतंत्र कमजोर होता है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लड़ाई विचारों की होनी चाहिए, न कि व्यक्तिगत या निचले स्तर की।