पिनराई विजयन ने राहुल गांधी पर किया तीखा हमला, कहा- वामपंथ को लेक्चर देना राजनीतिक अज्ञानता
सारांश
Key Takeaways
- पिनराई विजयन का राहुल गांधी पर हमला राजनीतिक अज्ञानता का उदाहरण है।
- विजयन ने भाजपा द्वारा अल्पसंख्यकों को डराने के लिए कानूनों के प्रयोग पर सवाल उठाया।
- सुधाकरन ने विजयन के संरक्षण के दावों को खारिज किया।
- अलाप्पुझा में गुटबाजी का लंबा इतिहास है।
- राज्य की राजनीति में यह विवाद महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत है।
तिरुवनंतपुरम, 4 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी पर जोरदार हमला करते हुए कहा कि वामपंथ को छत्तीसगढ़ में हमलों के मुद्दे पर “लेक्चर देने की कोशिश राजनीतिक अज्ञानता का एक शर्मनाक प्रदर्शन” है।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर विजयन ने कहा कि आज जिन कानूनों का उपयोग भाजपा अल्पसंख्यकों को डराने के लिए कर रही है, वे दरअसल कांग्रेस सरकारों द्वारा बनाए गए थे और दशकों तक संरक्षित रहे। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या राहुल गांधी में हिमाचल प्रदेश में, जहां कांग्रेस सत्तारूढ़ है, इन “कठोर धर्मांतरण विरोधी कानूनों” को समाप्त करने का साहस है?
विजयन ने यह भी कहा कि कांग्रेस ने ऐतिहासिक रूप से संघ परिवार के राजनीतिक उभार का रास्ता तैयार किया है, इसलिए उसे वामपंथ के धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा पर सवाल उठाने का कोई अधिकार नहीं है।
इस बीच, माकपा के बागी नेता जी सुधाकरन ने भी मुख्यमंत्री विजयन पर सीधा हमला किया। पूर्व मंत्री और चार बार विधायक रह चुके सुधाकरन ने विजयन के संरक्षण के दावों को खारिज करते हुए अपनी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान पर जोर दिया।
अलाप्पुझा से आने वाले सुधाकरन ने बताया कि उन्होंने 15 वर्ष की आयु में पार्टी जॉइन की थी और 63 वर्षों तक कम्युनिस्ट आंदोलन में सक्रिय रहे हैं। उन्होंने कहा कि 1967 के दौर में विजयन त्रावणकोर क्षेत्र में लगभग अज्ञात थे और मालाबार के थलसेरी तक ही सीमित थे।
सुधाकरन की यह तीखी टिप्पणी उस समय आई जब वे एक चुनावी कार्यक्रम में राहुल गांधी के साथ मंच साझा करते नजर आए, जो राज्य की राजनीति में एक बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
2021 विधानसभा चुनाव में पार्टी द्वारा किनारे किए जाने के बाद से सुधाकरन लो प्रोफाइल में थे, लेकिन पिछले महीने चुनाव की घोषणा के बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ने का ऐलान किया। इसके बाद कांग्रेस नेतृत्व वाले यूडीएफ ने उन्हें समर्थन दिया।
अलाप्पुझा, जिसे पारंपरिक रूप से वामपंथ का गढ़ माना जाता है, वहां लंबे समय से गुटबाजी देखने को मिलती रही है। 1996 में यहां बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ था, जब वरिष्ठ माकपा नेता वी. एस. अच्युतानंदन, जिन्हें मुख्यमंत्री बनने का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, एक स्थानीय कांग्रेस उम्मीदवार से हार गए थे। यह घटना पार्टी के अंदरूनी मतभेदों का उदाहरण मानी जाती है।