क्या राजराजेश्वरी मंदिर तंत्र की देवी मां राजराजेश्वरी का प्रमुख स्थान है?
सारांश
Key Takeaways
- राजराजेश्वरी मंदिर तंत्र विद्या की देवी का प्रमुख स्थान है।
- यहां 51 यंत्र हैं जो इच्छाओं की पूर्ति के लिए शक्तिशाली माने जाते हैं।
- इस मंदिर में दशहरा एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है।
- भक्त दीप जलाकर राहु का प्रभाव कम करने का प्रयास करते हैं।
- मंदिर की वास्तुकला प्राचीन और आध्यात्मिक है।
नई दिल्ली, 24 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के उत्तर से लेकर दक्षिण तक, मां जगदम्बा विभिन्न रूपों में प्रतिष्ठित हैं।
दक्षिण भारत में मां के उग्र स्वरूपों की पूजा अधिक होती है, जबकि आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में मां को सौंदर्य और आनंद की देवी के रूप में पूजा जाता है। इसके साथ ही, उन्हें तंत्र विद्या की देवी के रूप में भी सम्मानित किया जाता है। भक्त यहां तांत्रिक परंपरा के अनुसार मां की पूजा करने आते हैं और विशेष इच्छाओं की पूर्ति के लिए यज्ञ एवं हवन करते हैं।
आंध्र प्रदेश के नेल्लोर जिले में मां राजराजेश्वरी का शांत और सौम्य रूप विराजमान है। यह मंदिर आंध्र प्रदेश के प्रमुख हिंदू मंदिरों में शामिल है, जहाँ 51 यंत्र गर्भगृह में देखे जा सकते हैं। 51 यंत्र को इच्छापूर्ति के लिए अत्यंत शक्तिशाली माना गया है, जिसके कारण राजराजेश्वरी मंदिर को 51 शक्तिपीठों में स्थान मिला है। यहां मां राजराजेश्वरी का पूजन मुख्य रूप से किया जाता है, जिन्हें 10 महाविद्याओं में से एक माना जाता है। मां राजराजेश्वरी की पूजा ललिता, त्रिपुरासुंदरी और षोडशी के रूप में की जाती है।
यह मंदिर भक्तों के बीच अत्यंत प्रसिद्ध है, क्योंकि यहां की अनुष्ठान और विधि-पूर्वक पूजा से हर प्रकार की समस्याओं से मुक्ति मिलती है और तंत्र का प्रभाव कम होता है। यदि किसी की कुंडली में राहु दोष है, तो यहां 18 सप्ताह तक विशेष राहु काल दीपम का आयोजन होता है। इसमें लगातार 18 सप्ताह तक देसी घी और नींबू के दीये जलाए जाते हैं। ऐसा करने से राहु का प्रभाव कम होने की मान्यता है। भक्त मंदिर के परिसर में दीप जलाकर देवता की परिक्रमा करते हैं और प्रतिदिन चंडी होमम भी किया जाता है।
इस मंदिर में दशहरा एक बड़े उत्सव के रूप में मनाया जाता है। भक्त दिन-रात मां भगवती का पूजन करते हैं और मेले का आनंद लेते हैं। माना जाता है कि मां राजराजेश्वरी ने सृष्टि की रक्षा के लिए कई राक्षसों का वध किया था। राक्षसों पर मां भवानी की विजय को दशहरा के रूप में मनाया जाता है।
मंदिर से जुड़ी एक प्राचीन और प्रसिद्ध पौराणिक कथा है। कहा जाता है कि राजराजेश्वरी पीठाधिपति अरुल ज्योति नागराज मूर्ति विजयवाड़ा जा रहे थे। उन्होंने दुर्गामित्ता में विश्राम किया और देवी राजराजेश्वरी की उपस्थिति का अनुभव किया। उन्होंने अपने स्थानीय नेल्लोर के शिष्यों से उस मैदान में एक मंदिर बनाने का अनुरोध किया। मंदिर की वास्तुकला भी प्राचीन और आध्यात्मिक है। गर्भगृह की दीवारों पर नवग्रहों की प्रतिमाएँ अंकित हैं। गर्भगृह में मां राजराजेश्वरी की प्रतिमा अद्भुत है, जो मेरु यंत्र पर विराजमान हैं और उनके हाथों में शंख, चक्र और धनुष हैं। मां के दाईं ओर सरस्वती और बाईं ओर मां लक्ष्मी भी स्थापित हैं। मंदिर के निर्माण के बाद कई उप-मंदिर जैसे सुब्रह्मण्येश्वर स्वामी, भगवान श्री सुंदरेश्वर स्वामी, देवी गायत्री, और भगवान विनायक का निर्माण कराया गया।