क्या राज्यसभा में पीटी उषा ने वायनाड के कॉफी किसानों का मुद्दा उठाया?
सारांश
Key Takeaways
- मानव-वन्यजीव संघर्ष वायनाड के कॉफी किसानों के लिए एक मुख्य समस्या है।
- किसानों को यंत्रीकरण की आवश्यकता है।
- वायनाड को जीआई दर्जा प्राप्त है, लेकिन वैश्विक पहचान की जरूरत है।
- सरकार से समन्वित कार्रवाई की मांग की गई है।
- किसानों का भविष्य स्मार्ट फार्म्स में सुरक्षित किया जा सकता है।
नई दिल्ली, 17 दिसंबर (राष्ट्र प्रेस)। राज्यसभा में बुधवार को केरल के वायनाड के कॉफी किसानों का मुद्दा उठाया गया। सदन में जानकारी दी गई कि मानव और वन्यजीव संघर्ष के कारण यहाँ के लोगों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
राज्यसभा की सदस्य पीटी उषा ने वायनाड के कॉफी किसानों के समक्ष आ रहे संकट का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा कि वायनाड न केवल भारत की कॉफी अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, बल्कि यहाँ के हजारों ग्रामीण परिवारों की आजीविका भी इसी पर निर्भर करती है।
पीटी उषा ने मानव-वन्यजीव संघर्ष को सबसे गंभीर समस्या के रूप में बताया। उन्होंने उल्लेख किया कि जंगली जानवर बार-बार कॉफी बागानों में घुस रहे हैं, जिससे फसल को भारी नुकसान हो रहा है और मानव जीवन पर भी खतरा मंडरा रहा है। क्षेत्र के जंगलों पर अत्यधिक दबाव है, जिसके कारण जानवर भोजन और आश्रय की तलाश में बस्तियों और बागानों की ओर आ रहे हैं।
उन्होंने पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय तथा राज्य वन विभाग के समन्वय से तत्काल वैज्ञानिक और मानवीय वन्यजीव प्रबंधन उपाय करने की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने चेतावनी दी कि यदि तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो फसलों को होने वाला नुकसान और जनहानि बढ़ सकती है।
पीटी उषा ने कहा कि वर्तमान नुकसान आकलन की प्रक्रियाएँ पुरानी और दोषपूर्ण हैं, विशेषकर जलवायु परिवर्तन के इस युग में जब बाढ़ और अनियमित वर्षा आम हो गई है। उन्होंने मांग की कि कॉफी बोर्ड सभी हितधारकों की संयुक्त बैठक बुलाकर बीमा मानकों में सुधार करे और किसानों को समय पर और न्यायसंगत मुआवजा सुनिश्चित किया जाए।
उन्होंने श्रम की तीव्र कमी को भी एक गंभीर चुनौती बताया। उन्होंने कहा कि यंत्रीकरण अब केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बन चुका है। कॉफी बागान अब भी पुराने तरीकों पर निर्भर हैं, जिससे वे वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक नहीं रह गए हैं।
उन्होंने आग्रह किया कि कॉफी बोर्ड पहाड़ी क्षेत्रों के अनुरूप यंत्रीकरण और आधुनिक उपकरणों को बढ़ावा दे तथा किसानों और कृषि श्रमिकों को जोड़ने के लिए एक सरल मोबाइल प्लेटफॉर्म पर विचार करे, जिससे रोजगार की उपलब्धता और कार्यकुशलता में वृद्धि हो सके।
उन्होंने स्थानीय निकायों के हस्तक्षेप का मुद्दा भी उठाया, खासकर मानसून के दौरान यह हस्तक्षेप आवश्यक हो जाता है। कई बार स्थानीय निकाय पानी के स्रोतों को रोक देते हैं, जिससे कॉफी पौधों की जीवंतता को खतरा उत्पन्न होता है।
उन्होंने इस तरह की मनमानी कार्रवाइयों को रोकने के लिए स्पष्ट कानूनी दिशानिर्देश जारी करने की मांग की। पीटी उषा ने कहा कि 2030 तक भारतीय कॉफी खेतों को ‘स्मार्ट फार्म्स’ में बदलने की आवश्यकता है, जहाँ तकनीक, स्थिरता और प्रिसिजन एग्रीकल्चर के जरिए अगली पीढ़ी के किसानों का भविष्य सुरक्षित किया जा सके।
उन्होंने यह भी कहा कि वायनाड को जीआई (भौगोलिक संकेतक) दर्जा प्राप्त है, लेकिन अभी भी गुणवत्ता मूल्यांकन और वैश्विक पहचान तक समुचित पहुंच नहीं बन पाई है। इसके लिए उन्होंने वार्षिक कपिंग प्रतियोगिताओं और व्यापक जागरूकता कार्यक्रमों की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें कॉफी विशेषज्ञों की भागीदारी हो। अंत में, पीटी उषा ने सरकार से आग्रह किया कि वह वायनाड के कॉफी उत्पादकों के मुद्दे को गंभीरता से लेते हुए समयबद्ध और समन्वित कार्रवाई करे, ताकि इस महत्वपूर्ण क्षेत्र और किसानों की आजीविका की रक्षा की जा सके।