क्या आमिर खान ने 'गुलाम' में रानी मुखर्जी की आवाज डब करने का फैसला किया था?
सारांश
Key Takeaways
- रानी मुखर्जी का संघर्ष उनके करियर की नींव है।
- आमिर खान और करण जौहर ने उन्हें महत्वपूर्ण समर्थन दिया।
- हर कलाकार को अपने शुरूआती दिनों में चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।
- अपने आत्मविश्वास को बनाए रखना ज़रूरी है।
- फिल्म उद्योग में महिलाओं की स्थिति को बेहतर बनाने की आवश्यकता है।
मुंबई, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। बॉलीवुड की ‘मर्दानी’ रानी मुखर्जी के करियर में 30 साल की यात्रा पूरी हो चुकी है। 1997 में ‘राजा की आएगी बारात’ से अपने सफर की शुरुआत करने वाली रानी ने इन तीन दशकों में अपनी एक अलग पहचान बनाई है, लेकिन करियर के आरंभिक दिनों में अपनी भारी और कर्कश आवाज के कारण उन्हें कई अस्वीकृतियों का सामना करना पड़ा।
करियर के 30 साल के अवसर पर उन्होंने फिल्म निर्माता करण जौहर के साथ अपने अनुभव साझा किए। रानी ने कहा कि करण जौहर ने उनकी भारी आवाज पर विश्वास किया, जिसे पहले कई निर्माता नकार चुके थे। उन्होंने बताया कि करण ने उन्हें भविष्य की फिल्मों में अपनी आवाज को बनाए रखने में मदद की और आत्मविश्वास दिया।
पुरानी यादों को ताजा करते हुए, रानी ने फिल्म गुलाम के बारे में एक किस्सा साझा किया। उन्होंने कहा कि कैसे फिल्म में उनकी आवाज को डब करने का निर्णय लिया गया। रानी ने कहा, “एक नई कलाकार के रूप में आपके पास ज्यादा विकल्प नहीं थे। आमिर खान के साथ काम करना उस समय बहुत बड़ा अवसर था, इसलिए मैं अपने आवाज के डब करने के निर्णय पर कुछ नहीं कह पाई, लेकिन यह मेरे लिए एक दर्दनाक निर्णय था।”
उन्होंने बताया कि निर्देशक विक्रम भट्ट ने उन्हें बताया कि गुलाम में उनकी आवाज को डब करने का निर्णय विक्रम, निर्माता मुकेश भट्ट और आमिर खान ने मिलकर लिया था। आमिर ने इस फैसले का कारण भी बताया, “कभी-कभी फिल्म की भलाई के लिए अभिनेताओं को कुछ त्याग करना पड़ता है।” उन्होंने श्रीदेवी का उदाहरण देते हुए कहा कि उनकी भी कई फिल्मों में आवाज डब की गई, लेकिन इससे उनके करियर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा।
रानी ने यह भी बताया कि नए निर्माता होने के बावजूद करण जौहर ने उन पर भरोसा किया। उन्होंने कहा कि करण ने दबाव के बावजूद उनका समर्थन किया और उनकी आवाज को एक अभिनेत्री के रूप में उनकी पहचान का हिस्सा बना दिया। यदि उन्होंने ऐसा नहीं किया होता, तो उनकी कई फिल्मों में उनकी खुद की आवाजें नहीं होतीं।