संगमरमर के आश्रम में बच्चों की अनदेखी: स्विमिंग पूल और दूध की कमी का खुलासा
सारांश
Key Takeaways
- संगमरमर की भव्यता के बावजूद बच्चों की अनदेखी।
- स्विमिंग पूल पर बच्चों को नहाने की अनुमति नहीं।
- धार्मिक परंपराओं की अनदेखी।
- बच्चों को आवश्यक खाद्य सामग्री उपलब्ध नहीं।
- आश्रम की आंतरिक स्थिति पर सवाल।
गाजियाबाद, 27 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। लेखिका भूमिका द्विवेदी ने शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के मठ के बारे में चौंकाने वाले और गंभीर खुलासे किए हैं। उन्होंने राष्ट्र प्रेस से बातचीत में बताया कि मठ की इमारत पूर्णतः संगमरमर से निर्मित है, जिसमें कई मंजिलें हैं और सबसे ऊपर एक स्विमिंग पूल भी है, लेकिन मठ के युवा निवासी (बालक) को वहां नहाने की अनुमति नहीं दी जाती।
भूमिका ने साझा किया, "मैं स्वरूपानंद महाराज को अपने दादाजी के समान मानती हूं, क्योंकि महाराज जी मेरे दादाजी के पुराने मित्र रहे हैं। उनकी आज्ञा पर मैं 'धर्म और बनारस की संस्कृति' पर लिखने के उद्देश्य से बनारस गई थी। स्वरूपानंद महाराज जी अविमुक्तेश्वरानंद जी के गुरु रहे हैं। हालांकि, जब मैंने पहले बनारस का दौरा किया था, तब मैं लक्ष्मणदास गेस्ट हाउस में दो दिन के लिए रुकी थी, पर इस बार मैंने मठ में रहना बेहतर समझा। मेरा मानना था कि आश्रम में वैदिक नियमों का पालन होगा और शुद्ध शाकाहारी भोजन मिलेगा। पैसे को लेकर मेरा ये था कि जहां रुकेंगे, वहां दिया ही जाएगा, तो आश्रम में मांगा जाएगा। लेकिन, चूंकि वे मेरे दादाजी के शिष्य हैं, तो वहां पैसे का सवाल नहीं होना चाहिए था।"
भूमिका ने आगे बताया कि मठ के प्रबंधक ने उनसे चढ़ावे के लिए काफी दबाव डाला। उनका कहना था कि अन्य लोग इतना दान कर रहे हैं, तो आपको भी योगदान देना होगा। उन्होंने कहा, "आश्रम का माहौल बहुत अजीब और विलासिता से भरा हुआ था। बच्चों के साथ लापरवाही बरती जा रही थी। बच्चों को सुबह जल्दी नहीं उठाया जाता, न ही उन्हें गंगा स्नान करवाया जाता। सूर्य को अर्घ्य देना, तुलसी को जल चढ़ाना जैसी धार्मिक परंपराएं नहीं सिखाई जातीं।"
उन्होंने कहा कि आश्रम में कोई तुलसी का पौधा नहीं है, तो बच्चे जल कैसे चढ़ाएंगे? न ही बच्चों को छत पर जाने की अनुमति है, तो सूर्य को अर्घ्य कैसे देंगे? यहां तक कि बच्चों को योग भी नहीं सिखाया जाता। बच्चों के साथ ऐसा व्यवहार किया जा रहा है जैसे उन्हें किसी अनाथालय में छोड़ दिया गया हो।
भूमिका ने बताया कि आश्रम गौशाला होने का दावा करता है, लेकिन उन्होंने उसे देखा नहीं। बच्चों को गौशाला से दूध नहीं मिलता, जबकि प्रबंधक और दीदी लोगों को मिलता है। बढ़ते बच्चों के लिए दूध बहुत आवश्यक है, लेकिन उनकी सेहत की अनदेखी की जाती है। मठ का पूरा ढांचा संगमरमर से बना है, ऊपर एक स्विमिंग पूल है, और कुछ कमरों में एसी भी लगे हैं।