संजय राउत का महायुति सरकार पर कड़ा प्रहार, बिना नेता प्रतिपक्ष सदन चलाना संविधान का मजाक
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मुंबई, 23 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। महाराष्ट्र की राजनीतिक हलचल के बीच बजट सत्र की शुरुआत ने सियासी तापमान को बढ़ा दिया है। विधानसभा और विधान परिषद दोनों में नेता प्रतिपक्ष के पद की रिक्तता को लेकर विपक्ष ने सरकार पर कड़ी आलोचना की है। इसे उद्धव ठाकरे के गुट के सांसद संजय राउत ने लोकतंत्र से संबंधित एक गंभीर प्रश्न के रूप में पेश करते हुए सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।
सोमवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में राउत ने देवेंद्र फडणवीस और महायुति सरकार पर तीखा प्रहार करते हुए कहा कि बिना नेता प्रतिपक्ष के सदन का संचालन 'संविधान का मजाक' है। उनका आरोप है कि सरकार अपने बहुमत का दुरुपयोग कर लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को कमजोर कर रही है।
राउत ने स्पष्ट किया कि संसदीय लोकतंत्र में नेता प्रतिपक्ष की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि वही सरकार की जवाबदेही सुनिश्चित करता है। उन्होंने कहा कि विपक्ष के नेता के बिना सदन की कार्यवाही न केवल अनैतिक है, बल्कि यह संवैधानिक मूल्यों के खिलाफ भी है। उन्होंने सवाल उठाया कि जब सरकार के पास बहुमत है, तो वह विपक्षी नेता नियुक्त करने से क्यों बच रही है?
उन्होंने बताया कि लोकसभा, राज्यसभा और राज्यों की विधानसभाओं में नेता प्रतिपक्ष का पद लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है।
राउत ने कहा कि बिना नेता प्रतिपक्ष के सदन का संचालन लोकतंत्र का मजाक उड़ाने के समान है। उनका मानना है कि इससे सत्ता के निरंकुश होने का खतरा बढ़ता है और संस्थागत संतुलन बिगड़ सकता है।
राउत ने विशेष रूप से भारतीय जनता पार्टी और मुख्यमंत्री फडणवीस को निशाना बनाया। उन्होंने आरोप लगाया कि विपक्ष पिछले कई सत्रों से इस पद की मांग कर रहा है, लेकिन तकनीकी कारणों का हवाला देकर इसे टाला जा रहा है। इसे उन्होंने लोकतांत्रिक परंपराओं का हनन बताते हुए कहा।
राउत ने कहा कि यह संभवतः पहला अवसर है जब महाराष्ट्र में बजट सत्र के दौरान दोनों सदनों में नेता प्रतिपक्ष का पद रिक्त है। यदि इस मुद्दे का समाधान नहीं हुआ, तो विपक्ष कानूनी रास्ता अपनाने के साथ जनता के बीच भी जाएगा। आखिर भाजपा के मन में इतना डर क्यों है? आपके पास संख्या बल है, फिर भी आप सदन में एक आधिकारिक विपक्षी नेता को जगह देने से क्यों कतरा रहे हैं?
उन्होंने इसे लोकतांत्रिक मानदंडों का हनन बताते हुए आरोप लगाया कि सरकार संस्थागत नियंत्रण से बचना चाहती है।