क्या संकष्टी चतुर्थी पर विघ्न विनाशन को प्रसन्न करने का अद्भुत दिन है?

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क्या संकष्टी चतुर्थी पर विघ्न विनाशन को प्रसन्न करने का अद्भुत दिन है?

सारांश

संकष्टी चतुर्थी, एक महत्वपूर्ण पर्व है जो भगवान गणेश को समर्पित है। इस दिन विशेष पूजा विधियों के माध्यम से भक्त विघ्नों को दूर करने और सुख-समृद्धि की प्राप्ति के लिए व्रत रखते हैं। जानें इस पर्व के महत्व और पूजा विधि को।

Key Takeaways

  • संकष्टी चतुर्थी भगवान गणेश को समर्पित है।
  • इस दिन उपवास करने से विघ्न दूर होते हैं।
  • माताएं संतान के कल्याण के लिए व्रत रखती हैं।
  • पूजा विधि में स्नान, भोग और चंद्रोदय का अर्घ्य शामिल है।
  • यह पर्व परिवार की खुशहाली की कामना का प्रतीक है।

नई दिल्ली, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। सनातन धर्म में माघ महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि पर सकट चौथ या संकष्टी चतुर्थी का पर्व श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। यह व्रत विघ्नहर्ता और सुख-समृद्धि के दाता गौरी-पुत्र भगवान गणेश को समर्पित है। धार्मिक मान्यता है कि इस दिन विधि-विधान से गणेश जी की पूजा और उपवास करने से जीवन की सभी बाधाएं दूर होती हैं और हर क्षेत्र में सफलता प्राप्त होती है।

माताएं विशेष रूप से संतान की लंबी आयु और कल्याण के लिए यह व्रत रखती हैं। चंद्रोदय के बाद चंद्र दर्शन और अर्घ्य देने से व्रत पूर्ण होता है। इस पर्व के माध्यम से संकटों से मुक्ति और परिवार में खुशहाली की कामना की जाती है।

दृक पंचांग के अनुसार, इस साल सकट चौथ मंगलवार, 6 जनवरी को मनाई जाएगी। चतुर्थी तिथि 6 जनवरी को सुबह 8 बजकर 1 मिनट से शुरू होकर 7 जनवरी को सुबह 6 बजकर 52 मिनट तक रहेगी। इस दिन चंद्रोदय रात 8 बजकर 54 मिनट पर होगा।

सकट चौथ का व्रत मुख्य रूप से माताएं अपने पुत्रों की लंबी आयु, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि के लिए रखती हैं। उत्तर भारत में इसे सकट चौथ या तिलकुट चौथ भी कहा जाता है, जबकि महाराष्ट्र में इसे लंबोदर संकष्टी चतुर्थी के नाम से जाना जाता है। इस पर्व का विशेष महत्व है क्योंकि कृष्ण पक्ष की चतुर्थी भगवान गणेश को प्रसन्न करने वाली मानी जाती है।

सकट चौथ पर गौरी पुत्र की पूजा से जीवन के सभी संकट दूर होते हैं और सुख-समृद्धि की प्राप्ति होती है। माताएं सकट माता की भी पूजा करती हैं, जो संतान की रक्षा करती हैं। इस दिन उपवास रखकर भक्त संकटों से मुक्ति की कामना करते हैं।

धर्मशास्त्रों में उल्लेखित है कि भगवान गणेश को समर्पित व्रत कैसे रखें। सकट चौथ का व्रत सूर्योदय से चंद्रोदय तक रखा जाता है। कई भक्त निर्जला उपवास करते हैं, जबकि कुछ फलाहार या सात्विक भोजन ग्रहण करते हैं। इसके लिए सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत का संकल्प लें। दिन भर भगवान गणेश का स्मरण करें। शाम को विधिवत पूजन के बाद चंद्र दर्शन करें और दूध, जल से अर्घ्य दें। इसके बाद व्रत का पारण करें। यदि निर्जला व्रत कठिन लगे तो फल, दूध या अन्य हल्का सात्विक भोजन ले सकते हैं, लेकिन नमक से परहेज करना चाहिए।

संकष्टी चतुर्थी पर भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए स्नान के बाद स्वच्छ वस्त्र पहनें। गणेश जी को पंचामृत और जल से स्नान कराने के बाद घी और सिंदूर का लेप लगाएं। इसके बाद जनेऊ, रोली, इत्र, दूर्वा, फूल, चंदन, अबीर, लौंग चढ़ाकर धूप-दीप दिखाएं। गौरी पुत्र को तिल-गुड़ के लड्डू, मोदक या तिलकुट अतिप्रिय हैं, इसका भोग जरूर लगाएं।

पूजन के बाद भगवान गणेश के सामने गं गण गणपतये नमः मंत्र का जाप करें और संकट नाशन गणेश स्त्रोत, गणेश अथर्वशीर्ष स्तोत्र का पाठ करें। व्रत कथा पढ़ें या सुनें। शाम को चंद्रोदय के समय चंद्रमा को दूध मिश्रित जल से अर्घ्य दें। पूजा के बाद भोग प्रसाद बांटें और व्रत का पारण प्रसाद ग्रहण कर करें।

Point of View

बल्कि यह परिवार की खुशहाली और संतान के कल्याण की कामना का भी एक माध्यम है। समाज में इस पर्व का विशेष महत्व है, जो हमें एकजुटता और श्रद्धा के साथ मनाने की प्रेरणा देता है।
NationPress
06/01/2026

Frequently Asked Questions

संकष्टी चतुर्थी का महत्व क्या है?
यह पर्व भगवान गणेश को प्रसन्न करने के लिए मनाया जाता है और सभी प्रकार के विघ्नों को दूर करने की मान्यता है।
सकट चौथ पर किस प्रकार का उपवास रखा जाता है?
इस दिन भक्त निर्जला उपवास रखते हैं या फलाहार करते हैं।
संकष्टी चतुर्थी पर पूजा विधि क्या है?
भगवान गणेश का स्नान, भोग अर्पित करना और चंद्रोदय के समय अर्घ्य देना इस पूजा का मुख्य हिस्सा है।
क्या माताएं विशेष रूप से इस पर्व को मनाती हैं?
हाँ, माताएं अपने पुत्रों की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए इस दिन व्रत रखती हैं।
संकष्टी चतुर्थी कब मनाई जाती है?
यह पर्व माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है।
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