शंखो चौधरी: भारतीय आधुनिक मूर्तिकला के आधारशिला और कला के नायक
सारांश
Key Takeaways
- शंखो चौधरी का जन्म २५ फरवरी १९१६ को हुआ था।
- उन्होंने रामकिंकर बैज से मूर्तिकला की प्रेरणा ली।
- उनकी कला में अमूर्तता और भारतीय संतुलन का संगम है।
- उन्होंने बड़ौदा विश्वविद्यालय में एक अनूठा मूर्तिकला विभाग स्थापित किया।
- उनकी कृतियाँ ध्वनि और संगीत की अभिव्यक्ति करती हैं।
नई दिल्ली, २४ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। कल्पना कीजिए एक ऐसे युवा की, जिसकी आवाज गहरी और सुरीली थी। साल १९४२ के 'भारत छोड़ो आंदोलन' में भाग लेने के कारण वह जेल में था और सजा पूरी करने के बाद खुली हवा में सांस ले रहा था। उसके मन में एक द्वंद्व चल रहा था, "क्या मैं लोक गायक बन सकता हूँ? मेरी आवाज अच्छी है, लोग सुनेंगे।"
लेकिन किस्मत ने कुछ और ही ठान रखा था। उस युवा ने गाने के लिए कोई वाद्ययंत्र न उठाकर मिट्टी, कबाड़, पत्थरों और धातुओं को अपने साथी के रूप में चुना। जिस संगीत को वह गाना चाहता था, उसे उसने खामोश मूर्तियों में उकेर दिया। यह कहानी है भारतीय आधुनिक मूर्तिकला के पुरोधा शंखो चौधरी की।
२५ फरवरी १९१६ को तत्कालीन बिहार (अब झारखंड) के एक प्रतिष्ठित, लेकिन खुले विचारों वाले बंगाली जमींदार परिवार में जन्मे इस बच्चे का नाम 'नरनारायण' रखा गया, लेकिन दुनिया ने उसे प्यार से 'शंखो' कहा। शंखो चौधरी के घर पर साहित्य, अर्थशास्त्र, राजनीति और कला पर लंबी चर्चाएँ होती थीं। उनके बड़े भाई सचिन चौधरी थे, जिन्होंने बाद में प्रसिद्ध पत्रिका 'इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली' (ईपीडब्ल्यू) की स्थापना की। ऐसे बौद्धिक माहौल में पले-बढ़े शंखो के लिए पुरानी परंपराओं का पालन करना संभव नहीं था।
शंखो की कलात्मक यात्रा को असली उड़ान गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के 'शांतिनिकेतन' में मिली। यहाँ उनकी मुलाकात महान मूर्तिकार रामकिंकर बैज से हुई। रामकिंकर कंक्रीट, सीमेंट और मिट्टी से कला की रचना करते थे।
शंखो ने शुरुआत में कैनवस पर पेंटिंग की, लेकिन बैज की विशाल और जीवंत मूर्तियों को देखकर उनके भीतर के मूर्तिकार की पहचान हुई। उन्होंने पेंटिंग छोड़कर मूर्तिकला को अपनाया। १९४५ में जब वे बैज के साथ नेपाल गए, तो वहाँ उन्होंने 'लॉस्ट-वैक्स' धातु ढलाई की पारंपरिक तकनीक सीखी, जो आगे चलकर उनका सबसे बड़ा हथियार बनी।
शंखो चौधरी १९४९ में यूरोप की यात्रा पर गए। पेरिस की हवा ने उनके दृष्टिकोण को पूरी तरह बदल दिया। वहाँ उनकी मुलाकात उस समय के महान मूर्तिकार कॉन्स्टेंटिन ब्रांकुसी से हुई। ब्रांकुसी से उन्होंने सीखा कि किसी मूर्ति में बेवजह की सजावट की आवश्यकता नहीं है; उसका मूल रूप और एक ज्यामितीय लय ही पर्याप्त है।
यूरोप से लौटकर शंखो ने पश्चिमी कला की अंधी नकल नहीं की। उन्होंने विदेशी अमूर्तता को भारतीय उपनिषदों के संतुलन ('सम') के साथ खूबसूरती से जोड़ा।
भारत लौटते ही शंखो चौधरी के जीवन का सबसे प्रभावशाली चरण शुरू हुआ। उन्हें बड़ौदा (अब वडोदरा) की एमएस यूनिवर्सिटी में मूर्तिकला विभाग स्थापित करने का कार्य सौंपा गया। शंखो एक सामान्य प्रोफेसर नहीं थे। उन्होंने अंग्रेजों द्वारा बनाए गए बोरिंग सिलेबस को नकार दिया। उन्होंने कक्षाओं की दीवारें गिरा दीं और छात्रों को खुले आसमान के नीचे, प्रकृति के बीच काम करने का सिखाया। उनके घर, स्टूडियो और क्लासरूम के बीच कोई भेद नहीं था। छात्र अक्सर उनके घर पर चाय पीते हुए कला की बारीकियाँ सीखते थे।
शंखो की कहानी उनकी पत्नी इरा चौधरी के बिना अधूरी है। यह एक जादुई प्रेम कहानी थी, जिसने भारतीय कला को समृद्ध किया। इरा चौधरी मूलतः एक चित्रकार थीं, लेकिन शंखो की पारखी नजर ने उनके अंदर छिपे हुनर को पहचान लिया। उन्होंने इरा को 'पॉटरी' (मिट्टी के बर्तन बनाने की कला) सीखने के लिए प्रेरित किया। इसका परिणाम यह हुआ कि इरा चौधरी भारत की सबसे महान 'स्टूडियो पॉटर' बनकर उभरीं।
दिल्ली के 'ऑल इंडिया रेडियो' भवन में उनकी रिलीफ मूर्ति 'म्यूजिक' (१९५७) इस बात का अद्भुत उदाहरण है कि कैसे 'ध्वनि' और 'संगीत' जैसी अमूर्त चीज़ को पत्थर में उकेरा जा सकता है। ब्राजील के रियो डी जनेरियो में लगी महात्मा गांधी की कांस्य प्रतिमा, या उनके द्वारा बनाए गए पक्षियों और स्त्री आकृतियों की श्रृंखला, हर जगह एक खास तरह का घुमाव और मुक्ति का एहसास दिखाई देता है।
शंखो चौधरी सिर्फ एक मूर्तिकार नहीं थे। वे भारत की आधुनिक कला के वास्तुकार थे। दिल्ली के 'गढ़ी आर्टिस्ट स्टूडियो' की स्थापना से लेकर अनगिनत छात्रों के भविष्य को संवारने तक, उनका योगदान अतुलनीय है। २८ अगस्त २००६ को उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।