‘स्टॉपब्लीड’: एनआईटी के शोध से युद्ध में जख्मी सैनिकों का खून बहने से रोका जाएगा
सारांश
Key Takeaways
- स्टॉपब्लीड तकनीक रक्तस्राव को तेजी से नियंत्रित करती है।
- यह तकनीक आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा को सशक्त बनाती है।
- इसे सड़क दुर्घटनाओं और युद्ध में उपयोग किया जा सकता है।
- इसकी शेल्फ लाइफ तीन वर्ष है।
- यह तकनीक स्वीकृत है और जल्द ही बाजार में उपलब्ध होगी।
नई दिल्ली, २४ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। भारत के शैक्षणिक संस्थान अब युद्ध में घायल सैनिकों के खून बहने को रोकने में सहायक साबित होंगे। दरअसल, एनआईटी के छात्रों और शिक्षकों ने इस विषय पर एक महत्त्वपूर्ण अनुसंधान किया है। इस अनुसंधान को ‘स्टॉपब्लीड’ नाम दिया गया है, जिसका उद्देश्य सैन्य अभियानों के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव को त्वरित रूप से नियंत्रित करना है।
यहाँ खास बात यह है कि ‘स्टॉपब्लीड’ अनुसंधान अब शिक्षण संस्थान की प्रयोगशाला से निकलकर वास्तविक उपचार केंद्रों तक पहुँच रहा है। यह नवाचार राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी), राउरकेला द्वारा विकसित किया गया है। यह उत्पाद सड़क दुर्घटनाओं, गोली लगने, विस्फोटक चोटों, औद्योगिक दुर्घटनाओं, गहरे चाकू के घावों और अन्य गंभीर या जीवन-घातक ट्रॉमा स्थितियों में तीव्र रक्तस्राव को जल्दी नियंत्रित करने में सहायक है।
गौरतलब है कि कई सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों का मुख्य कारण अत्यधिक रक्तस्राव है। जब समय पर रक्त बहने को नियंत्रित नहीं किया जाता, तो इससे जान का नुकसान होता है। ये घटनाएँ अक्सर दूरदराज या ग्रामीण क्षेत्रों में होती हैं, जहाँ ट्रॉमा देखभाल और उपचार की सुविधाएँ तुरंत उपलब्ध नहीं होतीं।
एनआईटी राउरकेला द्वारा विकसित यह तकनीक इस कमी को दूर करने में सहायता कर सकती है। इससे दुर्घटनाओं में होने वाली मौतों में भी कमी आ सकती है। एनआईटी राउरकेला ने अपनी पेटेंट तकनीक को स्टार्टअप मीराक्यूल्स मेडसॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड को सौंप दिया है। यह एक तीव्र नैनो-बायोपॉलिमर हीमोस्टेट तकनीक है, जिसके लिए कमर्शियल उत्पादन और नैदानिक उपयोग की स्वीकृति भी प्राप्त हो चुकी है।
यह तकनीक आपातकालीन रक्तस्राव नियंत्रण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता रखती है। संस्थान का कहना है कि भारत में ट्रॉमा देखभाल एक बड़ी चुनौती है। इस संदर्भ में एनआईटी राउरकेला द्वारा विकसित स्टॉपब्लीड एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। स्टॉपब्लीड को सेंट्रल ड्रग्स स्टैण्डर्ड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन से क्लास सी मेडिकल डिवाइस के रूप में स्वीकृति मिल चुकी है। यह शैक्षणिक अनुसंधान को वास्तविक जीवन रक्षक चिकित्सा तकनीक में बदलने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
यह नवाचार पाउडर और पेलेट (छोटे दानों) के रूप में उपलब्ध एक उन्नत रक्तस्राव नियंत्रण समाधान है। इसे सड़क दुर्घटनाओं, सैन्य चोटों और आपातकालीन प्राथमिक उपचार की स्थितियों में उपयोग के लिए विशेष रूप से डिज़ाइन किया गया है। इसकी शेल्फ लाइफ तीन वर्ष है और इसे चिकित्सा पेशेवरों तथा गैर-चिकित्सीय प्राथमिक उपचारकर्ताओं द्वारा भी आसानी से उपयोग किया जा सकता है। नैनोफाइब्रस एग्रीगेट तकनीक पर आधारित यह उत्पाद रक्त प्लाज्मा को जल्दी अवशोषित करता है।
यह रक्त कोशिकाओं को उच्च सतह क्षेत्र वाले रेशेदार जाल में फंसा लेता है, जिससे शरीर की प्राकृतिक थक्का बनने की प्रक्रिया तेज होती है और घाव पर मजबूत हाइड्रोजेल सील बनती है। इससे खून निकलना बंद हो जाता है।
इसे जैव प्रौद्योगिकी और मेडिकल इंजीनियरिंग विभाग में प्रोफेसर देवेंद्र वर्मा और उनके शोध ग्रेजुएट साबिर हुसैन द्वारा विकसित किया गया था। इसके बाद इसका हस्तांतरण साबिर हुसैन के नेतृत्व वाले स्टार्टअप मिराकल्स मेड सॉल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड को उत्पादन, वितरण और क्षेत्रीय उपयोग के लिए किया गया।
एनआईटी राउरकेला के निदेशक प्रो. के. उमामहेश्वर राव ने कहा कि यह उत्पाद आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली को सशक्त बनाने की क्षमता रखता है। वहीं शोधकर्ता प्रो. देवेंद्र वर्मा ने कहा, “एनआईटी राउरकेला में हमारी प्रयोगशाला से स्टॉपब्लीड को सेंट्रल ड्रग्स स्टैण्डर्ड कंट्रोल आर्गेनाईजेशन से स्वीकृत मिलना अत्यंत संतोषजनक है। यह सैन्य परिस्थितियों या भारत के ग्रामीण क्षेत्रों में आपातकालीन स्थितियों के दौरान प्राथमिक उपचारकर्ताओं को रक्तस्राव शीघ्र नियंत्रित करने और जीवन बचाने में मदद कर सकता है।”
उन्होंने आगे कहा कि मैं आशा करता हूं कि यह उपलब्धि अधिक छात्रों को उद्यमिता अपनाने और उत्कृष्ट शोध को उपयोगी स्वास्थ्य समाधानों में परिवर्तित करने के लिए प्रेरित करेगी। भारत को आयात पर निर्भरता कम करने, लागत घटाने और स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप तकनीक विकसित करने के लिए अधिक स्वास्थ्य स्टार्टअप्स की आवश्यकता है।
अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों के अनुसार, इस नवाचार का कई प्रयोगशाला एवं पशुओं पर परीक्षण किया गया है, जिनमें संतोषजनक परिणाम प्राप्त हुए हैं। इसे बेंगलुरु स्थित संजय गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ ट्रॉमा एंड ऑर्थोपेडिक्स के सहयोग से प्रथम-मानव अध्ययन के माध्यम से वास्तविक नैदानिक वातावरण में भी परखा गया।
एनआईटी राउरकेला के पूर्व छात्र साबिर हुसैन के अनुसार, चयनित क्लिनिकल संस्थानों में सीमित स्तर पर स्टॉपब्लीड की तैनाती शुरू कर दी गई है। इस जीवन रक्षक नवाचार को भारत की आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा प्रणाली में व्यापक रूप से उपलब्ध कराने का प्रयास किया जा रहा है।