UP विधानसभा का विशेष सत्र: महिला आरक्षण विधेयक पर चर्चा, भाजपा-विपक्ष में तीखी जुबानी जंग
सारांश
Key Takeaways
- उत्तर प्रदेश विधानसभा का विशेष सत्र 30 अप्रैल 2026 को सुबह 11 बजे लखनऊ में बुलाया गया।
- राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने इस सत्र को महिला आरक्षण (संशोधन) विधेयक पर चर्चा के लिए आहूत किया।
- लोकसभा में विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े — संवैधानिक रूप से अनिवार्य दो-तिहाई बहुमत नहीं मिला।
- विधेयक का लक्ष्य संसद व विधायिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना था।
- BJP ने विपक्ष को 'महिला-विरोधी' बताया; समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने सरकार पर राजनीतिकरण का आरोप लगाया।
उत्तर प्रदेश विधानसभा का 2026 का दूसरा विशेष सत्र गुरुवार, 30 अप्रैल को सुबह 11 बजे लखनऊ में बुलाया गया है, जिसमें महिला आरक्षण (संशोधन) विधेयक पर चर्चा होनी है। राज्यपाल आनंदीबेन पटेल द्वारा आहूत इस सत्र से पहले ही सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और विपक्षी दल समाजवादी पार्टी व कांग्रेस के बीच राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है।
विशेष सत्र का उद्देश्य
अधिकारियों के अनुसार, इस विशेष सत्र का मुख्य मकसद यह है कि विधायक महिला आरक्षण विधेयक के लोकसभा में पारित न हो पाने के परिणामों पर चर्चा कर सकें। साथ ही, राज्य सरकार महिला सशक्तिकरण के प्रति अपने रुख को विधानसभा के मंच से एक बार फिर स्पष्ट करना चाहती है। यह सत्र ऐसे समय में बुलाया गया है जब विधेयक की विफलता को लेकर पूरे देश के राजनीतिक हलकों में बहस छिड़ी हुई है।
लोकसभा में विधेयक की विफलता
महिला आरक्षण विधेयक का उद्देश्य संसद और विधायिकाओं में महिलाओं को 33 प्रतिशत आरक्षण देना था। इसमें सदन की सदस्य संख्या बढ़ाने के प्रावधान भी शामिल थे। हालांकि, लंबी बहस के बावजूद यह विधेयक संवैधानिक रूप से अनिवार्य दो-तिहाई बहुमत हासिल करने में विफल रहा। अंतिम मतगणना में विधेयक के पक्ष में 298 और विरोध में 230 मत पड़े — पारित होने के लिए आवश्यक संख्याबल से यह कम था।
भाजपा और विपक्ष के आरोप-प्रत्यारोप
BJP ने विपक्षी दलों — विशेषकर कांग्रेस और उसके सहयोगियों — को 'महिला-विरोधी' करार दिया है। पार्टी का आरोप है कि विपक्ष ने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए लाए गए एक ऐतिहासिक कदम में बाधा डाली। दूसरी ओर, विपक्ष ने पलटवार करते हुए सरकार पर चुनावी फायदे के लिए महिला आरक्षण के मुद्दे का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है। आलोचकों का कहना है कि यह विशेष सत्र भी उसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा है।
आम जनता और महिला प्रतिनिधित्व पर असर
गौरतलब है कि भारत में संसद और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व वैश्विक औसत की तुलना में अभी भी काफी कम है। महिला आरक्षण विधेयक को इस खाई को पाटने की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा था। विधेयक के पारित न होने से महिला संगठनों और नागरिक समाज में निराशा है। अब उत्तर प्रदेश का यह विशेष सत्र यह तय करेगा कि राज्य स्तर पर इस मुद्दे को किस दिशा में आगे ले जाया जाता है।
आगे क्या होगा
विशेष सत्र में होने वाली चर्चा और उसके नतीजे राष्ट्रीय राजनीति में भी प्रतिध्वनित होंगे, क्योंकि उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और यहाँ की राजनीतिक हलचल केंद्र की नीतियों को भी प्रभावित करती है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि BJP और विपक्ष इस मुद्दे को किस तरह जनता के सामने रखते हैं।