क्या विजयलक्ष्मी पंडित ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई?
सारांश
Key Takeaways
- विजयलक्ष्मी पंडित का जन्म 18 अगस्त 1900 को हुआ।
- वह पंडित नेहरू की बहन थीं।
- महिलाओं के अधिकारों के लिए उनकी लड़ाई महत्वपूर्ण थी।
- विजयलक्ष्मी ने 1953 में संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्षता की।
- उनका योगदान स्वतंत्रता आंदोलन में अद्वितीय था।
नई दिल्ली, 30 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की बहन विजयलक्ष्मी पंडित की पुण्यतिथि 1 दिसंबर को है। विजयलक्ष्मी, जो अपने समय के प्रभावशाली वकील मोतीलाल नेहरू की दूसरी संतान थीं, का जन्म 18 अगस्त 1900 को प्रयागराज (तब का इलाहाबाद) में हुआ था।
विजयलक्ष्मी पंडित अपने बड़े भाई जवाहरलाल के बेहद करीबी रिश्ते में थीं और परिवार में लाड़ली मानी जाती थीं। शिक्षा के क्षेत्र में, उन्होंने केवल 12वीं कक्षा तक पढ़ाई की, जो एक निजी शिक्षक के माध्यम से पूरी की गई थी।
1921 में उन्होंने रंजीत सीताराम पंडित से विवाह किया, जो एक स्वतंत्रता सेनानी थे, और उनके पति की स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जेल में मृत्यु हो गई।
विजयलक्ष्मी, महात्मा गांधी से प्रेरित होकर, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से भाग लिया और कई बार जेल गईं।
उन्होंने अपने जीवन में हर भूमिका को कुशलता से निभाया और अपने कार्यों से अमिट छाप छोड़ी। स्वतंत्रता आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी को बढ़ावा देने और उनके अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ने में उनका योगदान महत्वपूर्ण था।
1953 में, वह संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष बनीं, जो कि इस पद पर बैठने वाली विश्व की पहली महिला थीं। उन्होंने इस संस्था की प्रमुख संस्थापक सदस्य के रूप में भी कार्य किया।
विजयलक्ष्मी पंडित को कोरियाई युद्ध के समाधान में और परमाणु आपदाओं को रोकने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के लिए जाना जाता है।
उनके राजनीतिक करियर की बात करें तो विजयलक्ष्मी पंडित 1937 में भारत की पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनीं, और उन्होंने अखिल भारतीय महिला सम्मेलन की अध्यक्षता की। इस दौरान, उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
विजयलक्ष्मी पंडित को संयुक्त राष्ट्र और रूस में भारत की पहली राजदूत नियुक्त किया गया था। उन्होंने अमेरिका में भी भारत की पहली राजदूत के रूप में कार्य किया। इसके अलावा, उन्होंने मैक्सिको, आयरलैंड और स्पेन में भी भारतीय राजदूत की भूमिका निभाई।
वह लिंग भेद का विरोध करने वाली और महिलाओं को राष्ट्र निर्माण में शामिल करने की बात करने वाली थीं।
विजयलक्ष्मी पंडित का निधन 1 दिसंबर 1990 को 90 वर्ष की आयु में देहरादून में हुआ था। मृत्यु के समय वे सार्वजनिक जीवन से संन्यास ले चुकी थीं।