क्या है विश्व एड्स दिवस? छूने से नहीं फैलता एड्स, जानें इस साल की थीम
सारांश
Key Takeaways
- एचआईवी और एड्स के बारे में सही जानकारी का प्रचार करना आवश्यक है।
- जागरूकता से डर और गलत धारणाएँ दूर की जा सकती हैं।
- समाज में सहानुभूति और समर्थन बढ़ाना महत्वपूर्ण है।
- भारत ने एचआईवी-एड्स के खिलाफ महत्वपूर्ण प्रगति की है।
- एचआईवी अब लाइलाज नहीं है, उचित इलाज से लोग स्वस्थ रह सकते हैं।
नई दिल्ली, 30 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। हर वर्ष 1 दिसंबर को ‘विश्व एड्स दिवस’ का आयोजन किया जाता है। यह दिन केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि एचआईवी-एड्स के खिलाफ वैश्विक संघर्ष का प्रतीक है। इस दिन का उद्देश्य एचआईवी और एड्स के बारे में सटीक जानकारी फैलाना, लोगों के मन में मौजूद डर और गलत धारणाओं को दूर करना, इस वायरस के साथ जी रहे लोगों को प्यार और समर्थन देना और जो लोग एड्स से गुजर चुके हैं, उन्हें स्मरण करना है।
इस वर्ष की थीम है, “व्यवधान पर विजय, एड्स प्रत्युत्तर में सुधार।” यह कई दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है। इस बीमारी के बारे में समाज में अनेक धारणाएँ मौजूद रही हैं। जानकारी की कमी और जागरूकता का अभाव मरीजों की समस्याओं को बढ़ावा देता है। इसके अलावा, दुनिया के विभिन्न हिस्सों में फैले युद्ध, गरीबी और भेदभाव ने भी बड़ी संख्या में लोगों को इलाज से दूर रखा है। हालांकि, वैश्विक स्तर पर कई संगठन और देश इस दिशा में कार्यरत हैं, जो सहायक सिद्ध हो रहे हैं।
‘विश्व एड्स दिवस’ की शुरुआत 1988 में विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा की गई थी। तब से हर साल, दुनियाभर की सरकारें, संगठन और आम लोग इस बीमारी के खिलाफ आवाज उठाते आ रहे हैं।
भारत में भी इस दिन का महत्व है। स्वास्थ्य मंत्रालय और नाको (राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन) के नेतृत्व में देशभर में जागरूकता कैंप, मुफ्त जांच कैंप, स्कूलों और कॉलेजों में कार्यक्रम और टीवी-रेडियो-सोशल मीडिया पर संदेश प्रसारित किए जाते हैं।
महत्वपूर्ण है कि एचआईवी अब कोई लाइलाज बीमारी नहीं है। समय पर जांच और दवा शुरू करने पर व्यक्ति पूरी उम्र स्वस्थ रह सकता है। भारत के आंकड़ों के अनुसार, यहाँ एचआईवी-एड्स के खिलाफ सफलता मिली है। 2024 से पहले, हर साल एड्स से लगभग 1 लाख 73 हजार लोग मरते थे, लेकिन यह संख्या 2024 में घटकर 32,200 रह गई है, जो कि 81 प्रतिशत से अधिक की कमी दर्शाता है।
सरकार 18 लाख से अधिक एचआईवी पॉजिटिव लोगों को मुफ्त दवा (एआरटी) उपलब्ध करा रही है, जिसमें 94 प्रतिशत मरीज नियमित रूप से दवा ले रहे हैं और 97 प्रतिशत मरीजों में वायरस इतना दब चुका है कि वे न बीमार पड़ते हैं और न किसी को संक्रमण देते हैं। इस कारण से एचआईवी अब एड्स में परिवर्तित नहीं हो पाता और लोग स्वस्थ जीवन जी रहे हैं।
हालांकि, दुनिया में हर साल 6 लाख 30 हजार लोग एड्स से मरते हैं। भारत विश्व को 70 प्रतिशत सस्ती दवाएं भी मुहैया करा रहा है, जिससे अफ्रीका से लेकर एशिया तक के लाखों लोगों को मदद मिलती है। संयुक्त राष्ट्र का 95-95-95 लक्ष्य (95 प्रतिशत लोगों को पता हो, 95 प्रतिशत को दवा मिले, 95 प्रतिशत में वायरस दब जाए) भारत लगभग पूरा कर चुका है।