क्या यादों में चंद्र: देवदास का दर्द, पारो का प्रेम और चंद्रमुखी की पीड़ा है?
सारांश
Key Takeaways
- शरत चंद्र चट्टोपाध्याय का लेखन सामाजिक समस्याओं पर आधारित था।
- उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाई।
- 'देवदास' और 'पारो' जैसे पात्रों के माध्यम से अविस्मरणीय प्रेम की कहानियाँ लिखीं।
- उनका जीवन संघर्ष और त्याग से भरा था।
- स्वतंत्रता संग्राम में उनका योगदान महत्वपूर्ण था।
नई दिल्ली, १५ जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। वह एक ऐसा लेखक था जिसके पास न कोई डिग्री थी, न समाज में रूतबा, और न ही जेब में पैसा, लेकिन जब उसने कलम उठाई, तो उसने बंगाल के भद्रलोक से लेकर रंगून के मजदूरों तक, हर दिल को जीत लिया। यह कहानी है बांग्ला साहित्य के अमर कथाशिल्पी, शरत चंद्र चट्टोपाध्याय की।
यह उस दौर की बात है जब शरत चंद्र को लोग थोड़ा-बहुत जानने लगे थे, लेकिन वे अपनी ही धुन में रहने वाले, मस्तमौला इंसान थे। लिखना उन्हें पसंद था, लेकिन आलस और बेफिक्री उन पर हावी रहती थी। उनके एक मित्र और प्रकाशक हरिदास चट्टोपाध्याय जानते थे कि इस शख्स के अंदर कहानियों का खजाना छिपा है, लेकिन उसे बाहर निकालना टेढ़ी खीर है।
एक दिन, हरिदास ने एक योजना बनाई। उन्होंने शरत चंद्र को दावत के बहाने अपने घर बुलाया। जब शरत पहुंचे, तो उन्हें एक कमरे में ले जाया गया। वहां मेज पर कागज, कलम, चाय और हुक्का सजा हुआ था। शरत कुछ समझ पाते, इससे पहले ही दरवाजा बाहर से बंद कर दिया गया। शर्त साफ थी, जब तक कहानी पूरी नहीं होगी, दरवाजा नहीं खुलेगा। शरत झुंझलाए, लेकिन फिर कलम उठाई और उस बंद कमरे से जो बाहर निकला, वह बांग्ला साहित्य का इतिहास बन गया। यह वही शरत चंद्र थे, जिन्होंने दुनिया को 'देवदास', 'परिणीता' और 'श्रीकांत' जैसी अमर कृतियां दीं।
१५ सितंबर १८७६ को हुगली के देवानंदपुर में जन्मे शरत का बचपन गरीबी और संघर्षों के साये में बीता। पिता मोतीलाल चट्टोपाध्याय एक स्वप्नदर्शी थे, जो कभी एक नौकरी पर टिक नहीं पाए। पिता की अलमारी में अधूरी कहानियों और उपन्यासों का ढेर था। नन्हे शरत अक्सर उन अधूरी कहानियों को पढ़ते और सोचते, "इनका अंत क्या होगा?" यहीं से उनके अंदर का कथाकार जागा। उन्होंने ठान लिया कि पिता जो कहानियां अधूरी छोड़ गए हैं, उन्हें वे अपनी कल्पना से पूरा करेंगे।
बचपन का एक बड़ा हिस्सा बिहार के भागलपुर में अपने ननिहाल में बीता। वहां शरत को पढ़ाई से ज्यादा दिलचस्पी गंगा के घाटों पर घूमने, पतंग उड़ाने और अखाड़े में कुश्ती लड़ने में थी। वे पढ़ाई में बहुत अच्छे नहीं थे, लेकिन जीवन की पाठशाला में वे अव्वल थे। उन्होंने समाज के उन कोनों को देखा, जहां 'सभ्य' लोग झांकना भी पसंद नहीं करते थे।
शरत चंद्र के जीवन का सबसे निर्णायक मोड़ तब आया जब वे गरीबी से तंग आकर १९०३ में रोजगार की तलाश में बर्मा (अब म्यांमार) चले गए। रंगून में बिताए उनके १३ साल किसी तपस्या से कम नहीं थे। वहां उन्होंने सरकारी क्लर्क की नौकरी की, लेकिन उनका असली ठिकाना वहां की बस्तियां थीं। वे मजदूरों, मिस्त्रियों और समाज के ठुकराए हुए लोगों के बीच रहे।
यहीं, परदेस में, उन्होंने अपनी पहली पत्नी शांति और एक साल के बेटे को प्लेग की महामारी में खो दिया। इस व्यक्तिगत त्रासदी ने उन्हें तोड़कर रख दिया, लेकिन इसी दर्द ने उनकी लेखनी को वह गहराई दी, जो आज भी पाठकों को रुला देती है। रंगून में ही रहते हुए उन्होंने 'चरित्रहीन' जैसी कालजयी रचना का ताना-बाना बुना। एक बार तो उनका घर जल गया और उनकी कई पांडुलिपियां, जिनमें 'चरित्रहीन' का पहला ड्राफ्ट भी था, राख हो गईं। लेकिन शरत ने हार नहीं मानी, उन्होंने अपनी याददाश्त से पूरी कहानी दोबारा लिख डाली।
शरत चंद्र का नाम आते ही जेहन में सबसे पहले 'देवदास' का नाम आता है। प्रेम में असफल, शराब में डूबा हुआ नायक। लेकिन क्या आप जानते हैं कि देवदास सिर्फ कोरी कल्पना नहीं थी? कहा जाता है कि देवदास के चरित्र में खुद शरत चंद्र की छवि है। वही आवेग, वही जिद्दीपन, और वही विद्रोही स्वभाव।
भागलपुर के लोग आज भी दावा करते हैं कि 'पारो' का किरदार शरत की बचपन की किसी प्रेमिका या उनके गांव के किसी जमींदार की दूसरी पत्नी से प्रेरित था। सच चाहे जो हो, लेकिन शरत ने देवदास के माध्यम से उस अधूरे प्रेम को अमर कर दिया, जो मिलन से ज्यादा विरह में पूर्ण होता है। उन्होंने दिखाया कि प्रेम त्याग है, अधिकार नहीं।
शरत चंद्र की सबसे बड़ी खूबी थी नारी मन की उनकी समझ। उस दौर में जब साहित्य में महिलाओं को सिर्फ आदर्श देवी या कुलक्षणी के रूप में दिखाया जाता था, शरत ने उन्हें 'इंसान' के रूप में पेश किया, चाहे वह 'बड़ी दीदी' की माधवी हो, 'देवदास' की चंद्रमुखी (एक वेश्या जिसे उन्होंने सम्मान दिया), या 'श्रीकांत' की राजलक्ष्मी।
उन्होंने समाज की दकियानूसी परंपराओं पर करारा प्रहार किया। उनकी नायिकाएं चुपचाप सहने वाली नहीं, बल्कि सवाल पूछने वाली थीं। 'स्वामी,' 'दत्ता,' और 'शेष प्रश्न' जैसी रचनाओं में उन्होंने स्त्री की स्वतंत्रता और उसके आत्मसम्मान की बात की।
उन्होंने समाज को आईना दिखाया कि कैसे 'कुल की मर्यादा' के नाम पर औरतों के सपनों का गला घोंटा जाता है। उनकी रचना 'नाजीर मूल्य' (नारी का मूल्य) इस बात का प्रमाण है कि वे नारीवादी सोच के कितने बड़े पक्षधर थे।
शरत चंद्र सिर्फ प्रेम कहानियों के लेखक नहीं थे। उनके अंदर एक आग थी जो देश की गुलामी के खिलाफ धधकती थी। उनका उपन्यास 'पथेर दाबी' (पथ के दावेदार) इतना क्रांतिकारी था कि ब्रिटिश सरकार ने इसे प्रतिबंधित कर दिया था। इसमें उन्होंने सशस्त्र क्रांति का समर्थन किया था, जो उस समय के अहिंसक आंदोलनों से अलग एक साहसी कदम था। वे कांग्रेस के जिला अध्यक्ष भी रहे और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय भूमिका निभाई।
रवींद्रनाथ टैगोर जैसे महान साहित्यकार भी उनकी लोकप्रियता के कायल थे। टैगोर ने एक बार कहा था कि उनकी कहानियों में बंगाल की मिट्टी की खुशबू है।
१६ जनवरी १९३८ को इस महान कथाशिल्पी ने दुनिया को अलविदा कह दिया। आज भी, जब कोई रेल के सफर में 'परिणीता' पढ़ता है, या किसी सिनेमा हॉल में 'देवदास' देखकर आंसू बहाता है।