क्या याचिकाकर्ता के सुझाव पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी है?

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क्या याचिकाकर्ता के सुझाव पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी है?

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने लावारिस कुत्तों के मामले में याचिकाकर्ता के सुझाव पर विचार किया। जस्टिस संदीप मेहता ने कुत्तों से सर्टिफिकेट मांगने पर सवाल उठाया। क्या यह समस्या समाधान की दिशा में एक सही कदम है? जानिए इस महत्वपूर्ण सुनवाई के बारे में।

Key Takeaways

  • सुप्रीम कोर्ट ने लावारिस कुत्तों की समस्या पर गंभीरता से चर्चा की।
  • याचिकाकर्ता का सुझाव एक नई पहल है।
  • स्टरलाइजेशन और वैक्सीनेशन की प्रक्रिया पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
  • पारदर्शिता और जिम्मेदारी की आवश्यकता है।
  • मानव सुरक्षा और जानवरों के अधिकारों के बीच संतुलन जरूरी है।

नई दिल्ली, 20 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को लावारिस कुत्तों के मामले में सुनवाई की। इस दौरान एक याचिकाकर्ता ने बताया कि उनके क्षेत्र में कई लावारिस कुत्ते हैं, जो रातभर भौंकते रहते हैं और एक-दूसरे का पीछा करते हैं, जिससे उन्हें नींद नहीं आती और उनके बच्चों की पढ़ाई में बाधा आती है।

याचिकाकर्ता ने इस समस्या को लेकर स्थानीय अधिकारियों से संपर्क किया, लेकिन उन्होंने केवल वैक्सीनेशन और स्टरलाइजेशन की प्रक्रिया की बात की। उन्होंने एनएचआरसी को पत्र भी लिखा, लेकिन कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। याचिकाकर्ता के वकील ने कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल रूल्स (एबीसी नियम) केवल सीमित दायरे में लागू होते हैं। कुत्तों को स्टरलाइज करने या वैक्सीनेट करने के बाद उन्हें फिर से छोड़ दिया जाता है।

एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि दुनिया भर में यह माना जाता है कि लावारिस कुत्तों की समस्या का समाधान करने के लिए प्रभावी नसबंदी की आवश्यकता है। जयपुर और गोवा जैसे शहरों में यह प्रणाली सफल रही है, लेकिन कई अन्य शहरों में यह प्रभावी नहीं हो पा रही है। स्टरलाइजेशन से कुत्तों की आक्रामकता में कमी आती है, लेकिन कई जगह यह सही तरीके से नहीं किया जा रहा है। इसे सुधारने के लिए पारदर्शिता और जिम्मेदारी की आवश्यकता होगी।

एक ऐसा तंत्र होना चाहिए, जिससे लोग उन लावारिस कुत्तों की जानकारी दे सकें जिनका स्टरलाइजेशन नहीं हुआ है। इसे किसी वेबसाइट पर दर्ज किया जा सकता है और कोई विशेष प्राधिकरण होना चाहिए जो शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करे।

प्रशांत भूषण के इस सुझाव पर जस्टिस संदीप मेहता ने टिप्पणी की कि हम कुत्तों से खुद सर्टिफिकेट लेकर चलने को क्यों नहीं कह सकते। प्रशांत भूषण ने कहा कि कोर्ट की कुछ टिप्पणियां गलत संदेश दे सकती हैं। उदाहरण के लिए, इसी कोर्ट ने कहा था कि कुत्तों के काटने के लिए फीडर्स को जिम्मेदार ठहराया जाए, जो शायद व्यंग्य था। जस्टिस विक्रम नाथ ने स्पष्ट किया कि यह व्यंग्य नहीं, बल्कि गंभीरता से कहा गया था।

इसके अलावा, एनिमल राइट्स एक्टिविस्ट और पूर्व केंद्रीय मंत्री द्वारा इस मामले पर किए गए पॉडकास्ट पर सुप्रीम कोर्ट ने नाराजगी जताई। कोर्ट ने पूर्व मंत्री की तरफ से पेश हुए वकील राजू रामचंद्रन से कहा कि पहले आपने कोर्ट की टिप्पणियों के बारे में सावधान रहने की बात की थी। क्या आपको पता है कि आपके क्लाइंट किस तरह की बातें कर रही हैं? आपके क्लाइंट ने कोर्ट की अवमानना की है। हम इस पर ध्यान नहीं दे रहे, यह हमारी उदारता है। क्या आपने उनका पॉडकास्ट सुना है? उनकी बॉडी लैंग्वेज कैसी है? वह क्या कहती हैं और कैसे कहती हैं। आपने टिप्पणी की कि कोर्ट को सावधान रहना चाहिए, लेकिन दूसरी ओर आपकी क्लाइंट जिसे चाहे उस पर टिप्पणी कर रही हैं।

सुप्रीम कोर्ट इस मामले में मानव सुरक्षा, एबीसी नियमों के क्रियान्वयन और जानवरों के अधिकारों के बीच संतुलन बनाने पर विचार कर रहा है। सुनवाई आगे जारी रहेगी।

Point of View

NationPress
20/01/2026

Frequently Asked Questions

लावारिस कुत्तों के मामले में सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया क्या थी?
सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता के सुझाव पर गहन विचार किया और इस विषय पर गंभीरता से चर्चा की।
क्या कोर्ट ने कोई विशेष निर्देश दिए?
कोर्ट ने सुझाव दिया कि एक तंत्र होना चाहिए जो लावारिस कुत्तों की रिपोर्टिंग को सक्षम बनाए।
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