क्या मेजर ध्यानचंद हॉकी के जादूगर हैं जिन्होंने हिटलर का प्रस्ताव ठुकराया?

सारांश
Key Takeaways
- मेजर ध्यानचंद ने तीन ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीते।
- उनका खेल कौशल अद्वितीय था।
- उन्होंने हिटलर का प्रस्ताव ठुकराया।
- ध्यानचंद का असली नाम ध्यान सिंह था।
- उनकी याद में राष्ट्रीय खेल दिवस मनाया जाता है।
नई दिल्ली, 28 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। मेजर ध्यानचंद को 'हॉकी के जादूगर' के नाम से जाना जाता है। उनका खेल अद्वितीय था। जब गेंद उनके पास होती, तो इसे उनसे छीनना असंभव लगता था। मेजर ध्यानचंद ने भारत को तीन ओलंपिक स्वर्ण पदक दिलवाए। उनकी गिनती दुनिया के महानतम खिलाड़ियों में होती है। आज भी भारतीय उनके खेल की याद करके गर्व महसूस करते हैं।
29 अगस्त 1905 को प्रयागराज में जन्मे ध्यान सिंह के पिता ब्रिटिश सेना में थे और हॉकी के शौकीन थे। पिता के रास्ते पर चलते हुए ध्यान सिंह ने महज 16 साल की उम्र में सिपाही के रूप में सेना में शामिल होकर हॉकी खेलना शुरू किया।
ध्यान सिंह के मित्र उन्हें 'चंद' के नाम से जानते थे, क्योंकि वह अक्सर चांदनी रात में घंटों हॉकी की प्रैक्टिस करते थे। इसीलिए उनका नाम 'ध्यानचंद' पड़ा।
सेना में रहते हुए, ध्यानचंद ने रेजिमेंटल मैच खेलना शुरू कर दिया। 1922 से 1926 के बीच उनके शानदार खेल ने उन्हें सुर्खियों में ला दिया।
ध्यानचंद की प्रतिभा को देखते हुए उन्हें सेना की टीम में न्यूजीलैंड दौरे के लिए चुना गया। इस दौरे पर उन्होंने शानदार प्रदर्शन किया, और सेना की टीम ने 18 मैच जीते, केवल एक में हार मिली।
जब नवगठित भारतीय हॉकी महासंघ (आईएचएफ) ने 1928 ओलंपिक के लिए एक टीम भेजने का निर्णय लिया, तो ध्यानचंद को ट्रायल के लिए बुलाया गया। उन्होंने न केवल टीम में स्थान पाया, बल्कि पांच मैचों में 14 गोल दागकर शीर्ष स्कोरर बने। भारतीय हॉकी टीम ने पूरे टूर्नामेंट में अजेय रहकर गोल्ड जीता।
साल 1928, 1932 और 1936 के ओलंपिक खेलों में भारत को हॉकी में गोल्ड मेडल जिताने में मेजर ध्यानचंद का अहम योगदान रहा। 'हॉकी के जादूगर' ने तीन ओलंपिक के 12 मुकाबलों में 37 गोल दागे।
1936 ओलंपिक में ध्यानचंद के शानदार प्रदर्शन के कारण भारत ने जर्मनी को 8-1 से हराया। जर्मनी की हार से हिटलर बहुत नाराज हुआ और वह मैच के बीच में स्टेडियम से बाहर चला गया।
इस मैच के बाद हिटलर ने ध्यानचंद से मुलाकात की और उन्हें अपनी सेना में उच्च पद का प्रस्ताव दिया, लेकिन ध्यानचंद ने विनम्रता से इसे ठुकरा दिया।
जब मेजर ध्यानचंद खेलते थे, तो गेंद उनकी हॉकी स्टिक से चिपक जाती थी। हॉलैंड के खिलाफ एक मैच के दौरान उनकी हॉकी स्टिक को तोड़कर जांच की गई, लेकिन उन्हें निर्दोष पाया गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के अंत तक ध्यानचंद 40 वर्ष के हो चुके थे। 1948 में स्वतंत्र भारतीय हॉकी टीम के ओलंपिक में भाग लेने पर, उन्होंने टीम में शामिल होने से मना कर दिया, क्योंकि उनका मानना था कि अब युवा खिलाड़ियों को मौका देना चाहिए।
ध्यानचंद ने भारतीय सेना में लगभग 34 वर्ष की सेवा दी। वह 1956 में लेफ्टिनेंट के पद से रिटायर हुए।
लगभग 22 वर्षों तक मेजर ध्यानचंद ने भारत के लिए हॉकी खेलते हुए 400 से अधिक गोल दागे। इस दिग्गज हॉकी खिलाड़ी को 'पद्म भूषण' से सम्मानित किया गया और उनके नाम पर मेजर ध्यानचंद खेल रत्न अवॉर्ड दिया जाता है।
3 दिसंबर 1979 को मेजर ध्यानचंद ने कैंसर से जंग लड़ते हुए अंतिम सांस ली। भारत में 29 अगस्त को उनके जन्मदिन को 'राष्ट्रीय खेल दिवस' के रूप में मनाया जाता है।