भविष्य में 3डी प्रिंटिंग से हड्डियों और कार्टिलेज के इलाज में आएगा बड़ा बदलाव
सारांश
Key Takeaways
- 3डी प्रिंटिंग से भविष्य में हड्डियों और कार्टिलेज के इलाज में बदलाव आएगा।
- बायो-इंक से टिश्यू जैसी संरचनाएं बनाई जाएंगी।
- एनआईटी राउरकेला के शोधकर्ताओं ने इस तकनीक का विकास किया है।
- इस तकनीक से व्यक्तिगत उपचार की संभावनाएं बढ़ेंगी।
- प्रयोगशाला परीक्षणों में 90%25 कोशिकाएं जीवित रहीं।
नई दिल्ली, 20 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। भारत के एक प्रसिद्ध तकनीकी शिक्षा संस्थान ने एक नई तकनीक का विकास किया है, जो भविष्य में टूटी हुई हड्डियों और क्षतिग्रस्त कार्टिलेज (उपास्थि) के उपचार के तरीके को बदल सकती है। शोधकर्ताओं की टीम ने टिश्यू इंजीनियरिंग या टिश्यू जैसी संरचनाओं की 3डी प्रिंटिंग तकनीक का आविष्कार किया है। इसके लिए एक उन्नत ‘बायो-इंक’ तैयार की गई है और इसका पेटेंट भी प्राप्त किया गया है। यह उपलब्धि एनआईटी राउरकेला के अनुसंधानकर्ताओं ने हासिल की है।
सरल शब्दों में कहा जाए तो, बायो-इंक, एक विशेष प्रकार की जैविक स्याही है, जो 3डी प्रिंटर के माध्यम से शरीर के अंदर टिश्यू जैसी संरचनाएं बनाने में उपयोग की जाती है। अब तक सबसे बड़ी समस्याओं में से एक यह थी कि ऐसी स्याही की उपलब्धता कठिन थी, जो न केवल मजबूत हो, बल्कि मानव शरीर के अनुकूल भी हो और प्रिंटिंग में आसानी से काम करे।
इस नई खोज ने इस कमी को पूरा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे पुनर्योजी चिकित्सा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। यदि आगे के परीक्षण सफल होते हैं, तो भविष्य में 3डी प्रिंटिंग के माध्यम से हड्डियों और कार्टिलेज की मरम्मत करना सरल और अधिक सुलभ हो सकता है। इस शोध का नेतृत्व प्रो. देवेंद्र वर्मा ने किया, जिनके साथ शोधार्थी श्रेया चरंगू और डॉ. तन्मय भरद्वाज भी शामिल रहे।
टीम ने प्रोटीन और प्राकृतिक शर्करा (पॉलीसैकराइड) को मिलाकर एक विशेष बायो-इंक तैयार किया। यह न केवल प्रिंटिंग के दौरान अपनी संरचना बनाए रखता है, बल्कि कोशिकाओं की वृद्धि में भी मदद करता है। इस बायो-इंक को बनाने के लिए बोवाइन सीरम एल्ब्यूमिन, सोडियम एल्गिनेट, जिलेटिन और काइटोसान जैसे पदार्थों का मिश्रण किया गया है। यह मिश्रण शरीर के टिश्यू के बाहरी ढांचे जैसा वातावरण तैयार करता है, जिससे कोशिकाएं आसानी से चिपकती हैं, बढ़ती हैं और सही तरीके से विकसित होती हैं।
प्रयोगशाला परीक्षणों में इस तकनीक ने अद्भुत परिणाम दिए हैं। इससे बने ढांचों में 90 प्रतिशत से अधिक कोशिकाएं जीवित रही, जो इसकी सफलता का एक बड़ा संकेत है। इसके साथ ही इसमें हड्डी निर्माण और कोलेजन बनने की क्षमता भी देखी गई, जो टिश्यू की मरम्मत के लिए अत्यंत आवश्यक है। इस तकनीक की विशेषता यह है कि इससे बहुत सटीक आकार वाले टिश्यू तैयार किए जा सकते हैं।
इसका अर्थ है कि भविष्य में मरीज के शरीर के अनुसार बिल्कुल फिट बैठने वाले टिश्यू बनाए जा सकेंगे। इससे व्यक्तिगत उपचार को नई दिशा मिल सकती है। शोधकर्ताओं के अनुसार, यह बायो-इंक मरीज के अनुसार विशेष डिजाइन वाले टिश्यू बनाने में सहायता करेगा, जिससे उपचार अधिक प्रभावी हो सकता है। वर्तमान में, यह तकनीक प्रारंभिक चरण में है। आगे पशुओं पर परीक्षण किए जाने हैं और उसके बाद मनुष्यों पर नैदानिक परीक्षण की दिशा में काम किया जाएगा।