क्या बसंत पंचमी पर शृंगेरी शारदा पीठम में होता है 'अक्षराभ्यास', ज्ञान की देवी बच्चों को देती हैं विशेष आशीर्वाद?
सारांश
Key Takeaways
- बसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी को मनाया जाएगा।
- शृंगेरी शारदा पीठम शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र है।
- यहां अक्षराभ्यास की परंपरा महत्वपूर्ण है।
- मंदिर का इतिहास रामायण के समय से जुड़ा है।
- निसंतान दंपत्ति यहां संतान प्राप्ति के लिए आते हैं।
नई दिल्ली, 21 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। ज्ञान की देवी मां सरस्वती को समर्पित बसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी को मनाया जाएगा। इस दिन विद्यालयों से लेकर मंदिरों तक विशेष पूजा-पाठ और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
दक्षिण भारत में मां सरस्वती को समर्पित कई मंदिर हैं, जिनमें से एक शृंगेरी शारदा पीठम है, जहां महर्षियों ने तप किया। यही कारण है कि यहां शिक्षा प्राप्त करने के लिए अनेक लोग आते हैं।
कर्नाटक के चिकमंगलुर जिले में तुंगा नदी के किनारे स्थित शृंगेरी शारदा पीठम की स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। यहां महर्षि ऋष्यश्रृंग गिरी ने मां जगदम्बा स्वरूप सरस्वती की तपस्या की थी। बसंत पंचमी पर मंदिर को फूलों से सजाया जाता है और अक्षराभ्यास (शिक्षा का आरंभ) की परंपरा निभाई जाती है। इस दौरान हजारों बच्चे मां सरस्वती के सामने बैठकर पहला अक्षर लिखते हैं, जिससे उनकी बुद्धि और ज्ञान में वृद्धि होती है।
भक्त मंदिर में सुबह से मां के दर्शन के लिए आते हैं और विभिन्न अनुष्ठानों में भाग लेते हैं। मंदिर के पुजारी भक्तों की इच्छाओं के अनुसार यज्ञ कराते हैं। शृंगेरी शारदा पीठम का इतिहास बहुत समृद्ध है और इसे रामायण के समय से भी पुराना माना जाता है। यहां राजा दशरथ ने पुत्रकामेष्टि यज्ञ कराया था, जिसके परिणामस्वरूप प्रभु श्रीराम का जन्म हुआ। आज भी कई निसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिए इस मंदिर में आते हैं।
12वीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य ने सनातन धर्म की परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए पीठों की स्थापना करने की इच्छा जताई थी। एक बार उन्होंने देखा कि एक नाग प्रसव पीड़ा से पीड़ित मेंढक को बचाने के लिए अपनी छाया दे रहा था। इस दृश्य ने उन्हें गहन ज्ञान दिया। इसी स्थल पर उन्होंने शृंगेरी शारदा पीठम की स्थापना की, जो आज भी अपने वैदिक शिक्षा के लिए प्रसिद्ध है।