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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: केवल अपील लंबित रहने से मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा, बंगाल में एसआईआर के संदर्भ में

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सुप्रीम कोर्ट का निर्णय: केवल अपील लंबित रहने से मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा, बंगाल में एसआईआर के संदर्भ में

सारांश

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान केवल अपील लंबित रहने से मतदान का अधिकार नहीं मिलेगा। अपीलें समय सीमा से पहले स्वीकार होनी चाहिए। जानिए और क्या कहा गया है।

मुख्य बातें

सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मतदान अधिकार को स्पष्ट करता है।
केवल अपील लंबित होने पर वोट देने का अधिकार नहीं मिलेगा।
अपीलें समय सीमा से पहले स्वीकार होनी चाहिए।
एसआईआर प्रक्रिया के तहत 34 लाख से अधिक अपीलें दायर की गई हैं।
अगली सुनवाई 24 अप्रैल को होगी।

नई दिल्ली, १६ अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान संशोधित मतदाता सूची से बाहर किए गए व्यक्तियों को मतदान का अधिकार तभी दिया जाएगा, जब उनकी अपीलें निर्धारित समयसीमा से पहले अपीलीय न्यायाधिकरण द्वारा स्वीकार की जाएं।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्य कांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने यह स्पष्ट किया कि केवल अपील लंबित होने के आधार पर किसी व्यक्ति को वोट देने का अधिकार नहीं मिल सकता।

अदालत ने अपने आदेश में कहा कि यदि अपीलीय न्यायाधिकरण किसी अपील को स्वीकार करते हुए मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का निर्देश देता है, तो ऐसे निर्देशों को मतदान से पहले अनुपूरक संशोधित मतदाता सूची जारी कर लागू किया जाना चाहिए।

संविधान के अनुच्छेद १४२ के तहत अपनी शक्तियों का उपयोग करते हुए, शीर्ष अदालत ने भारतीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) को निर्देश दिया कि २१ अप्रैल या २७ अप्रैल (मतदान चरण के अनुसार) तक निपटाई गई अपीलों के आदेशों को लागू करते हुए अनुपूरक मतदाता सूची जारी की जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन लोगों की अपीलें अभी भी लंबित हैं, वे केवल इसी आधार पर मतदान का अधिकार नहीं मांग सकते। अदालत ने कहा, “यह स्पष्ट है कि अपील लंबित रहने मात्र से मतदान का अधिकार नहीं मिलता।”

यह टिप्पणी उन याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की गई, जिनमें मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद अपील लंबित रहने तक अस्थायी रूप से नाम बहाल करने की मांग की गई थी। अदालत ने इस मांग को खारिज करते हुए कहा कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत न्यायिक अधिकारियों द्वारा सत्यापन के बाद ऐसे व्यक्तियों को ‘अप्रामाणिक’ पाया गया है, जिससे उनके नाम पहले से शामिल होने का अनुमान समाप्त हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी उल्लेख किया कि अब तक ३४ लाख से अधिक अपीलें अपीलीय न्यायाधिकरणों के समक्ष दायर की जा चुकी हैं, जिनमें गलत तरीके से नाम हटाने के साथ-साथ नए नाम जोड़े जाने को भी चुनौती दी गई है।

अदालत ने कहा कि यदि केवल लंबित अपीलों के आधार पर बाहर किए गए लोगों को वोट देने की अनुमति दी जाती है, तो यह एक असामान्य स्थिति पैदा करेगा, जहाँ आपत्ति करने वाले भी उन लोगों को मतदान से वंचित करने की मांग कर सकते हैं जिनके नाम सूची में बने हुए हैं, जबकि उनके खिलाफ अपील लंबित है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि उसके पूर्व निर्देशों के अनुसार गठित सभी १९ अपीलीय न्यायाधिकरण अब पूरी तरह कार्यरत हैं और पूर्व न्यायाधीशों की समिति द्वारा तय मानक संचालन प्रक्रिया (एसओपी) के तहत काम कर रहे हैं।

गौरतलब है कि अदालत ने पहले ही निर्देश दिया था कि एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची से नाम हटाने के फैसलों के खिलाफ अपील सुनने के लिए पूर्व हाई कोर्ट मुख्य न्यायाधीशों और न्यायाधीशों वाले अपीलीय न्यायाधिकरण बनाए जाएं। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि इन फैसलों को कार्यपालिका या प्रशासनिक प्राधिकरणों के समक्ष चुनौती नहीं दी जा सकती। इस मामले में अगली सुनवाई २४ अप्रैल को निर्धारित है।

संपादकीय दृष्टिकोण

यह लोकतंत्र की मजबूती के लिए आवश्यक है।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या केवल अपील लंबित होने पर मतदान का अधिकार मिल सकता है?
नहीं, केवल अपील लंबित होने पर मतदान का अधिकार नहीं मिलता है।
एसआईआर के दौरान मतदान का अधिकार कैसे प्राप्त किया जा सकता है?
मतदाता सूची से बाहर किए गए व्यक्तियों को केवल तब मतदान का अधिकार मिलेगा, जब उनकी अपीलें समय सीमा से पहले स्वीकार की जाएं।
सुप्रीम कोर्ट ने अपीलीय न्यायाधिकरणों के बारे में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सभी 19 अपीलीय न्यायाधिकरण पूरी तरह कार्यरत हैं।
क्या नाम हटाने के खिलाफ अपील की जा सकती है?
हाँ, गलत तरीके से नाम हटाने के खिलाफ अपील की जा सकती है।
इस मामले में अगली सुनवाई कब है?
इस मामले में अगली सुनवाई 24 अप्रैल को निर्धारित की गई है।
राष्ट्र प्रेस
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