क्या भारत और जापान के बीच जेसीएम पर सहमति बनी है?

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क्या भारत और जापान के बीच जेसीएम पर सहमति बनी है?

सारांश

भारत और जापान के बीच जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए महत्वपूर्ण सहयोग ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुए हैं। यह समझौता पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के तहत संयुक्त ऋण व्यवस्था को मजबूती देगा। जानें, इस सहयोग का भारत की जलवायु नीति पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

Key Takeaways

  • भारत और जापान के बीच जलवायु सहयोग का महत्वपूर्ण क्षण।
  • संयुक्त ऋण व्यवस्था के तहत सहमति पर हस्ताक्षर।
  • जलवायु परिवर्तन शमन के लिए निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों का विकास।
  • भारत की नेट जीरो उत्सर्जन की दिशा में एक बड़ा कदम।
  • अन्य देशों के साथ कार्बन क्रेडिट का अंतरराष्ट्रीय व्यापार।

नई दिल्ली, 29 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) ने संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) के पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के अंतर्गत संयुक्त ऋण व्यवस्था (जेसीएम) पर जापान सरकार के साथ एक सहयोग ज्ञापन (एमओसी) पर हस्ताक्षर किए हैं। यह कदम जलवायु कार्रवाई के प्रति भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता को दर्शाता है और पेरिस समझौते के कार्यान्वयन में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है।

इस महीने की शुरुआत में किए गए एमओसी पर हस्ताक्षर भारत-जापान सहयोग के एक महत्वपूर्ण पहलू 'बेहतर भविष्य के लिए हरित ऊर्जा फोकस' का हिस्सा हैं, जिस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को अपनी जापान यात्रा के दौरान जोर दिया था।

भारत और जापान के बीच आर्थिक, वाणिज्यिक और सांस्कृतिक सहयोग का एक समृद्ध इतिहास रहा है। वर्तमान सहयोग ज्ञापन का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन शमन पर भारत और जापान के बीच साझेदारी को मजबूत करना है। पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6 के कार्यान्वयन के लिए राष्ट्रीय नामित एजेंसी (एनडीएआईएपीए) द्वारा अनुच्छेद 6.2 के अंतर्गत अनुमोदित निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियां, 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने के लिए भारत की दीर्घकालिक निम्न-कार्बन विकास रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

हालांकि, वर्तमान में यह रणनीति काफी खर्चीली है और इसके लिए व्यवहार्यता अंतर निधि की आवश्यकता है। संयुक्त आयोग (जेसीएम) इन कम कार्बन प्रौद्योगिकियों से संबंधित परियोजनाओं के कार्यान्वयन के लिए निवेश प्रवाह, प्रौद्योगिकी सहायता, जिसमें प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण समर्थन शामिल है, को प्रोत्साहित करेगा। यह निम्न कार्बन प्रौद्योगिकियों और उपकरणों, मशीनरी, उत्पादों, प्रणालियों और बुनियादी ढांचे से संबंधित उच्च प्रौद्योगिकी हस्तक्षेपों को स्थानीयकृत करने के लिए घरेलू पारिस्थितिकी तंत्र और साझेदारियां भी विकसित करेगा, जिससे उनके बड़े पैमाने पर उपयोग का मार्ग प्रशस्त होगा।

यह सहयोग ज्ञापन भारत में ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) में कमी या निष्कासन तथा सतत विकास में योगदान देने वाली परियोजनाओं के कार्यान्वयन को और सुगम बनाएगा। यह पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के अंतर्गत ऐसी परियोजनाओं से उत्पन्न कार्बन क्रेडिट का जापान और अन्य देशों के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी संभव बनाएगा, जिससे भारत की राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) प्रतिबद्धताओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।

पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय को केंद्रीय मंत्रिमंडल से कार्यान्वयन नियमों (आरओआई) को अंतिम रूप देने और भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों और विदेश मंत्रालय (एमईए) के परामर्श से पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के तहत इसी तर्ज पर अन्य देशों के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए अनुमोदन भी प्राप्त हुआ है।

Point of View

यह कहना उचित है कि भारत और जापान के बीच का यह सहयोग ज्ञापन जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का सामना करने में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं को मजबूत करेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी स्थिति को भी सशक्त बनाएगा।
NationPress
30/08/2025

Frequently Asked Questions

भारत और जापान के बीच जेसीएम का उद्देश्य क्या है?
जेसीएम का उद्देश्य जलवायु परिवर्तन शमन के लिए दोनों देशों के बीच साझेदारी को मजबूत करना है।
इस सहयोग ज्ञापन के तहत क्या प्रौद्योगिकियां शामिल हैं?
इसमें निम्न-कार्बन प्रौद्योगिकियों को शामिल किया गया है, जो 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन प्राप्त करने में सहायक होंगी।
क्या यह सहयोग भारत के एनडीसी पर प्रभाव डालेगा?
नहीं, यह सहयोग भारत की राष्ट्रीय विकास परिषद (एनडीसी) प्रतिबद्धताओं पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा।