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क्या रामविलास के 'चिराग' राजनीति में 'एक्शन' लेकर आए?

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क्या रामविलास के 'चिराग' राजनीति में 'एक्शन' लेकर आए?

सारांश

चिराग पासवान का सफर फिल्मी पर्दे से राजनीति के अनेकों उतार-चढ़ाव तक का है। क्या वह अपने पिता की विरासत को सहेजते हुए बिहार के विकास में एक नई दिशा देंगे? जानें उनके संघर्ष और प्रेरणादायक कहानी के बारे में।

मुख्य बातें

चिराग पासवान का सफर राजनीति में एक नई पहचान बनाना है।
फिल्मी करियर की असफलता ने उन्हें राजनीति में आने के लिए प्रेरित किया।
बिहार के विकास के लिए उनका दृष्टिकोण स्पष्ट है।
उन्होंने अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाया है।
चुनावों में उनकी रणनीति ने उन्हें सफलता दिलाई है।

नई दिल्ली, 30 अक्टूबर (राष्ट्र प्रेस)। साल 2011 में रिलीज हुई फिल्म का नाम था 'मिले ना मिले हम', जिसमें बॉलीवुड की क्वीन कंगना रनौत मुख्य भूमिका में थीं। यह फिल्म बॉक्स ऑफिस पर पूरी तरह से असफल रही, और जिस युवा अभिनेता को उम्मीद थी कि यह उसकी सफलता का दरवाजा खोलेगी, उसके लिए यह एक कड़वा अनुभव बन गया। वह हीरो, जिसने कैमरे के सामने अपनी पूरी मेहनत लगाई थी, जल्दी ही यह समझ गया कि उसकी किस्मत मुंबई के चकाचौंध में नहीं, बल्कि बिहार की राजनीति से दिल्ली तक फैली है।

यह युवा अभिनेता और कोई नहीं, बल्कि केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के अध्यक्ष चिराग पासवान हैं। उन्होंने पहले इंजीनियरिंग की पढ़ाई की, फिर अभिनय में किस्मत आजमाई, और अंततः अपने पिता की राजनीतिक विरासत को संभालने के लिए लौट आए। चिराग का जीवन किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं है।

चिराग पासवान का जन्म 31 अक्टूबर 1982 को हुआ था। वह भारत के प्रसिद्ध दलित नेताओं में से एक राम विलास पासवान और रीना पासवान के पुत्र हैं।

उन्होंने पहले कंप्यूटर साइंस में बीटेक की डिग्री हासिल की, लेकिन उनका दिल तो मुंबई की मायानगरी में था। चिराग ने बॉलीवुड में अपनी किस्मत आजमाने का फैसला किया। 2011 में उनकी पहली और एकमात्र फिल्म 'मिले ना मिले हम' रिलीज हुई, जिसमें उन्होंने लीड रोल निभाया, लेकिन यह दर्शकों के दिलों में स्थान नहीं बना पाई।

फिल्म की असफलता ने चिराग को गहरा सदमा दिया। वह समझ गए कि यह उनका क्षेत्र नहीं है। यह क्षण उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। अगर वह फिल्म सफल हो जाती, तो शायद आज चिराग किसी स्टूडियो के सेट पर होते, लेकिन उस असफलता ने उन्हें वापस उसी जगह पहुंचा दिया, जहां उनके पिता वर्षों से एक 'महानायक' बने हुए थे।

फिल्मी पर्दे से उतरकर, चिराग ने अपने पिता रामविलास पासवान के मार्गदर्शन में राजनीति की बारीकियां सीखनी शुरू की। उन्होंने जमीनी हकीकत को समझना शुरू किया और जल्दी ही यह समझ गए कि राजनीतिक क्षेत्र में सफल होने के लिए केवल नाम काफी नहीं है, बल्कि जनता से सीधा जुड़ाव और एक स्पष्ट दृष्टि होना आवश्यक है।

2014 में चिराग ने बिहार की जमुई लोकसभा सीट से अपना पहला चुनाव लड़ा। यह उनके लिए अग्निपरीक्षा थी। फिल्मी दुनिया में असफल रहे चिराग ने राजनीति में पहले ही प्रयास में शानदार जीत हासिल की।

2019 में उन्होंने जमुई सीट पर अपनी जीत को दोहराया। इस बीच, उन्होंने पार्टी के संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में भी काम किया और अपने पिता के साथ कंधे से कंधा मिलाकर पार्टी की रणनीतियों में शामिल रहे। पिता-पुत्र की यह जोड़ी राजनीति में एक भावनात्मक स्तंभ बन गई।

चिराग पासवान के जीवन में सबसे महत्वपूर्ण मोड़ 2020 में आया, जब उनके पिता रामविलास पासवान का निधन हो गया। इस क्षति ने न केवल चिराग को भावनात्मक रूप से तोड़ दिया, बल्कि लोक जनशक्ति पार्टी की पूरी बागडोर उनके कंधों पर आ गई। पिता के निधन के तुरंत बाद, पार्टी में दरार पड़ गई। उनके चाचा, पशुपति पारस और पार्टी के अन्य सदस्यों ने चिराग के नेतृत्व को चुनौती दी, जिसके कारण लोजपा दो गुटों में बंट गई। चिराग को पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न के लिए कानूनी और राजनीतिक लड़ाई लड़नी पड़ी।

इस मुश्किल समय में, चिराग ने 'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' का नया नारा दिया। उन्होंने खुद को केवल दलित नेता की विरासत का वाहक नहीं बताया, बल्कि एक युवा, आधुनिक नेता के रूप में पेश किया, जिसकी प्राथमिकता बिहार का विकास है।

उन्होंने अपने पिता की 'लोक जनशक्ति पार्टी' का नाम बदलकर 'लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास)' रखा। उन्होंने इस चुनौती को एक अवसर में बदल दिया। उन्होंने आधुनिक संवाद शैली अपनाई, सोशल मीडिया पर सक्रिय रहे और रैलियों में बिहारियों के सामने अपनी बात रखी।

चिराग पासवान के संघर्ष और रणनीति का सबसे शानदार परिणाम 2024 के लोकसभा चुनाव में देखने को मिला। अपनी पार्टी को एनडीए में मजबूती से स्थापित करते हुए, उन्होंने बिहार में एक 'गेम चेंजर' की भूमिका निभाई। उनकी पार्टी ने पांच सीटों पर चुनाव लड़ा और अविश्वसनीय रूप से 100 प्रतिशत स्ट्राइक रेट के साथ जीत हासिल की।

खुद को पीएम मोदी का 'हनुमान' कहने वाले चिराग ने 2024 के लोकसभा चुनाव में अपने पिता की पारंपरिक सीट, हाजीपुर से चुनाव लड़ा। यह सीट रामविलास पासवान के लिए भावनात्मक और राजनीतिक रूप से सबसे महत्वपूर्ण थी। चिराग ने इस सीट पर 1.70 लाख से अधिक वोटों के विशाल अंतर से जीत हासिल की और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तीसरी सरकार में केंद्रीय कैबिनेट मंत्री के रूप में उन्हें स्थान मिला।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि बिहार के विकास के लिए भी नई दिशा देने का प्रयास कर रहे हैं। उनका संघर्ष एक युवा नेता की कहानी को दर्शाता है, जो अपने नेतृत्व में अपने राज्य को मजबूती प्रदान करना चाहता है।
RashtraPress
29 जून 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

चिराग पासवान का राजनीतिक सफर कैसे शुरू हुआ?
चिराग पासवान ने अपने पिता की राजनीति में गहरी रुचि के कारण फिल्मी करियर छोड़कर राजनीति में कदम रखा।
उनकी प्रमुख उपलब्धियाँ क्या हैं?
चिराग पासवान ने जमुई लोकसभा सीट से लगातार दो बार चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई।
चिराग पासवान का नारा क्या है?
'बिहार फर्स्ट, बिहारी फर्स्ट' चिराग का नया नारा है, जो बिहार के विकास को प्राथमिकता देता है।
राष्ट्र प्रेस
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