अभिजीत दिपके का दिल्ली पुलिस पर पलटवार: 'वकील से बात माँगने वाला हिस्सा वीडियो से क्यों काटा?'
सारांश
मुख्य बातें
अभिजीत दिपके ने दिल्ली पुलिस द्वारा जारी वीडियो पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि पुलिस ने उस हिस्से को वीडियो से हटा दिया जिसमें वे अपने वकीलों से बात करने और अपने चचेरे भाई का नंबर निकालने के लिए मोबाइल फोन माँग रहे थे। 10 अक्टूबर 2026 को नई दिल्ली में सिटीज़न्स फॉर जस्टिस एंड पीस (CJP) के प्रदर्शन से पहले दिपके और उनके साथियों को पुलिस ने हिरासत में लिया था।
मुख्य घटनाक्रम
10 अक्टूबर 2026 को CJP के प्रदर्शन से पूर्व ही दिल्ली पुलिस ने अभिजीत दिपके और उनके कई साथियों को हिरासत में ले लिया। हिरासत के दौरान दिपके की दादी का निधन हो गया — एक ऐसा दुखद संयोग जो इस पूरे विवाद का केंद्र बन गया है। CJP की ओर से आरोप लगाया गया कि दादी के निधन के बाद भी पुलिस ने दिपके को परिजनों से बात करने की अनुमति नहीं दी।
इसके जवाब में दिल्ली पुलिस ने एक वीडियो जारी कर दावा किया कि दिपके को माता-पिता से बात करने और सहायता लेने की पेशकश की गई थी, किंतु उन्होंने स्वयं इनकार किया। पुलिस के इस बयान को दिपके ने खारिज करते हुए वीडियो में काट-छाँट का आरोप लगाया है।
दिपके के आरोप — वीडियो में क्या छुपाया गया?
दिपके ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि जारी किए गए वीडियो से वह हिस्सा हटा दिया गया जिसमें वे अपना मोबाइल फोन माँग रहे थे — ताकि अपने चचेरे भाई का नंबर निकाल सकें और अपने वकीलों से संपर्क कर सकें। उन्होंने कहा, 'आपने वह हिस्सा क्यों हटा दिया, जिसमें मैं अपना फोन माँग रहा था ताकि अपने चचेरे भाई का नंबर ले सकूँ और मैं अपने वकीलों से बात करने की माँग कर रहा था?'
दिपके ने मीडिया से बातचीत में स्पष्ट किया कि दादी के निधन की सूचना मिलने पर उन्होंने चचेरे भाई से बात करने के लिए फोन माँगा। पुलिस ने फोन देने के बजाय नंबर माँगा, लेकिन नंबर उन्हें याद नहीं था। नंबर देखने के लिए फोन जरूरी था — जो पुलिस ने नहीं दिया।
रात साढ़े तीन बजे गिरफ्तारी के कागज़ — दिपके का सवाल
दिपके ने कहा कि जो पुलिस दादी के निधन की खबर देकर 'नैतिकता का दिखावा' कर रही थी, वही पुलिस रात 3:30 बजे गिरफ्तारी के कागज लेकर आई और हस्ताक्षर करने का दबाव बनाया। उन्होंने पूछा कि 'सुबह 3:30 बजे वह सारी इंसानियत कहाँ चली गई थी?'
दिपके के अनुसार, उन्होंने तब तक गिरफ्तारी के कागज पर हस्ताक्षर करने से इनकार किया जब तक उन्हें वकीलों से बात करने की अनुमति नहीं मिली। उनका आरोप है कि उन्हें वकील से संपर्क करने का कानूनी अधिकार भी प्रारंभ में नहीं दिया गया।
उन्होंने यह भी बताया कि पुलिस ने उनसे यह भी कहा कि वे रात साढ़े तीन बजे अपने माता-पिता को फोन करके सूचित करें कि उन्हें गिरफ्तार किया जा चुका है — जबकि उनके माता-पिता स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से जूझ रहे हैं।
दिपके का आगे का रुख
दिपके ने स्पष्ट किया कि उन्होंने कोई बॉन्ड साइन नहीं किया है और वे दोबारा सड़कों पर उतरेंगे। उनका कहना है कि पुलिस के व्यवहार में बुनियादी मानवीयता का अभाव था। यह मामला अब नागरिक अधिकारों, हिरासत में कानूनी सहायता और पुलिस की जवाबदेही के व्यापक सवालों से जुड़ गया है।
गौरतलब है कि यह विवाद ऐसे समय में सामने आया है जब हिरासत में अधिकारों को लेकर देशभर में बहस तेज है। आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि दिल्ली पुलिस दिपके के आरोपों पर क्या आधिकारिक प्रतिक्रिया देती है और क्या न्यायिक या प्रशासनिक जाँच की माँग उठती है।