क्या <b>गंगा मां</b> के सामने अहंकार सही है? स्वामी <b>जितेंद्र सरस्वती</b> का <b>अविमुक्तेश्वरानंद</b> पर कटाक्ष
सारांश
Key Takeaways
- गंगा मां के प्रति सम्मान की आवश्यकता है।
- राजनीतिक मुद्दों का धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप चिंता का विषय है।
- हिंदू समाज को एकजुट होने की आवश्यकता है।
प्रयागराज, 22 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। हाल ही में प्रयागराज के संगम घाट पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती और माघ मेले प्रशासन के बीच का विवाद सनातन धर्म और हिंदू समाज में गहरी चिंता का कारण बना है। इस मुद्दे पर मध्य प्रदेश के उज्जैन के स्वामी जितेंद्र सरस्वती और वाराणसी के महामंडलेश्वर ज्ञान दास महाराज ने अपनी प्रतिक्रियाएँ दीं।
महामंडलेश्वर ज्ञान दास महाराज ने कहा, "प्रयागराज की यह घटना हमारे धर्म के लिए बेहद दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक है। पुलिस और प्रशासन ने हमारे युवा सेवकों के साथ जिस तरह का व्यवहार किया, वह सही नहीं है। इससे हिंदुओं के बीच फूट पड़ने की संभावना बनती है। इस घटना के लिए जिम्मेदार व्यक्तियों पर कार्रवाई होनी चाहिए। मैं इस तरह के प्रशासनिक व्यवहार की कड़ी निंदा करता हूँ।"
उन्होंने आगे कहा, "ऐसी घटनाएँ हमारे सनातन धर्म को बांटने वाली हैं। हमें उन लोगों को दोषी ठहराना होगा जो इस घटना के लिए जिम्मेदार हैं, ताकि हमारा हिंदू समाज एकजुट हो सके।"
वहीं उत्तर प्रदेश के वाराणसी से स्वामी जितेंद्र सरस्वती ने कहा कि ऐसे मामले पहले भी हुए हैं जब बटुकों ने पुलिस पर हाथ डाला। इस बार सुरक्षा के लिए बैरिकेड लगाए गए थे ताकि कुंभ या माघ मेले के दौरान रथ 2 किमी दूर खड़े किए जा सकें और स्नान क्षेत्र में कोई सामान या वाहन नहीं लाया जा सके।
उन्होंने सवाल किया, "आपको अचानक क्या हुआ कि आप 50 मीटर पैदल चलने को तैयार नहीं हैं? क्या यह अहंकार है? एक बेटा अपनी मां (गंगा) के सामने निवस्त्र हो जाता है, लेकिन यहाँ अहंकार क्यों?" इसके साथ ही उन्होंने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की शंकराचार्य पदवी पर सवाल उठाते हुए कहा कि स्वरूपानंद जी के समाधि के बाद कोई संन्यासी मौजूद नहीं था और उन्होंने खुद को उत्तराधिकारी घोषित कर दिया। उन्होंने इसे राजनीतिक षड्यंत्र बताया और कहा कि वहाँ कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी के लोग ज्यादा थे।