क्या जेन जी में बढ़ती एंग्जाइटी के पीछे वैज्ञानिक कारण और समाधान हैं?
सारांश
Key Takeaways
- एंग्जाइटी का स्तर युवाओं में तेजी से बढ़ रहा है।
- सोशल मीडिया ने तुलना की संस्कृति को बढ़ावा दिया है।
- स्वास्थ्य के लिए मनोवैज्ञानिक सहायता आवश्यक है।
- समय पर काउंसलिंग और खुला संवाद मददगार हो सकता है।
- शारीरिक गतिविधि और नींद का सही समय महत्वपूर्ण है।
नई दिल्ली, 30 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। बदलती जीवनशैली, सोशल मीडिया की निरंतर उपस्थिती और शिक्षा-नौकरी के दबाव ने आज के युवा मन को पहले से कहीं अधिक प्रभावित करना शुरू कर दिया है। भारत सहित कई देशों में जेन जी, विशेषकर 25 साल से कम उम्र के युवाओं में, चिंता और तनाव का स्तर पिछले कुछ वर्षों में तेजी से बढ़ा है।
2023 में एसआरएम यूनिवर्सिटी एपी (आंध्र प्रदेश), अमरावती और अन्य भागीदार संस्थानों ने भारत के आठ प्रमुख शहरों—हैदराबाद, चेन्नई, बैंगलुरु, पुणे, मुंबई, अहमदाबाद, कोलकाता और दिल्ली के 1,628 युवाओं पर एक व्यापक अध्ययन किया। इस अध्ययन में लगभग 70 फीसदी प्रतिभागियों में मध्यम से गंभीर स्तर की एंग्जाइटी, 60 फीसदी में डिप्रेशन और 70 फीसदी से अधिक में उच्च स्तर का डिस्ट्रेस दर्ज किया गया।
अध्ययन के अनुसार, युवाओं में एंग्जाइटी बढ़ने के मुख्य कारणों में प्रतिस्पर्धा का बढ़ना, करियर की अनिश्चितता, मनोवैज्ञानिक दबाव और भविष्य को लेकर चिंता शामिल हैं। सोशल मीडिया ने तुलना की संस्कृति को असामान्य रूप से बढ़ा दिया है, जहां हर व्यक्ति दूसरे की उपलब्धियों को देखकर अपने आप को कमतर आंकता है। यह मानसिक रूप से बेहद हानिकारक साबित हो रहा है। इसके अतिरिक्त, पढ़ाई और काम का बोझ, परिवार और समाज की अपेक्षाएं तथा आर्थिक दबाव भी युवाओं में बेचैनी और तनाव को और बढ़ाते हैं।
अध्ययन ने समाधान की भी चर्चा की है। इसमें बताया गया है कि मनोवैज्ञानिक सहायता, समय पर काउंसलिंग, नियमित शारीरिक गतिविधि, नींद का सही समय, सोशल मीडिया का सीमित उपयोग और परिवार-दोस्तों के साथ भावनात्मक रूप से खुला संवाद युवाओं में एंग्जाइटी को कम करने में मदद कर सकता है।
वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित यह तथ्य भी महत्वपूर्ण है कि तनाव को साझा करने से मानसिक बोझ कम होता है और दिमाग राहत की स्थिति में आता है। इस उम्र में भावनात्मक उतार-चढ़ाव स्वाभाविक हैं, लेकिन जब चिंता लगातार बनी रहे तो इसे समझना और समय पर कदम उठाना बहुत जरूरी है।