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क्या साधन नहीं संकल्प रचता है इतिहास? यादों में नोबेल विजेता हर गोबिंद खुराना

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क्या साधन नहीं संकल्प रचता है इतिहास? यादों में नोबेल विजेता हर गोबिंद खुराना

सारांश

हर गोबिंद खुराना की अद्भुत वैज्ञानिक यात्रा ने यह साबित किया कि साधन नहीं, संकल्प ही इतिहास को आकार देता है। उनकी जीवनगाथा में छिपे प्रेरणादायक तत्वों को जानें।

मुख्य बातें

हर गोबिंद खुराना का जीवन संघर्ष और संकल्प का प्रतीक है।
उन्होंने जेनेटिक कोड की व्याख्या में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
उनकी शिक्षा यात्रा ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई।

नई दिल्ली, 8 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। एक छोटा सा गांव, जहां साक्षरता अपवाद थी और संसाधन नगण्य थे, वहां से एक ऐसी वैज्ञानिक यात्रा की शुरुआत हुई जिसने जीवन के सबसे गूढ़ रहस्यों, जेनेटिक कोड की व्याख्या की दिशा तय की। 9 नवंबर 2011 को दुनिया ने वैज्ञानिक हर गोबिंद खुराना को खो दिया, लेकिन उनका जीवन आज भी इस सवाल का जवाब देता है कि साधन नहीं, संकल्प इतिहास रचता है।

9 जनवरी 1922 को पंजाब प्रांत के रायपुर गांव (वर्तमान पाकिस्तान) में जन्मे हर गोबिंद खुराना ऐसे परिवार में पले-बढ़े, जहां शिक्षा ही सबसे बड़ी पूंजी थी। उनके पिता ब्रिटिश शासन में पटवारी थे। गरीबी के बावजूद बच्चों की पढ़ाई के प्रति उनका समर्पण अडिग था। लगभग सौ लोगों की आबादी वाले उस गांव में खुराना का परिवार व्यावहारिक रूप से एकमात्र साक्षर परिवार था।

उनकी शिक्षा यात्रा मुल्तान के डीएवी हाई स्कूल से शुरू होकर लाहौरपंजाब विश्वविद्यालय तक पहुंची, जहां उन्होंने एमएससी की डिग्री प्राप्त की। इस दौरान शिक्षक रतन लाल और पर्यवेक्षक महान सिंह का प्रभाव उनके शैक्षणिक संस्कारों में गहराई से उतरा।

1945 में भारत सरकार की फैलोशिप ने उन्हें इंग्लैंड पहुंचाया। लिवरपूल विश्वविद्यालय में पीएचडी के दौरान रोजर जेएस बीयर ने न केवल उनके शोध का मार्गदर्शन किया, बल्कि उनके नए संसार की देखरेख भी की। यहीं से खुराना पश्चिमी सभ्यता और संस्कृति से परिचित हुए।

1948-49 में ज्यूरिख की ईडगेनॉस्चे टेक्निशे होचशूले में प्रोफेसर व्लादिमीर प्रेलोग के साथ बिताया गया पोस्ट डॉक्टोरल वर्ष खुराना के वैज्ञानिक दर्शन को आकार देने वाला साबित हुआ। विज्ञान, कार्य और प्रयास को देखने का उनका नजरिया यहीं परिपक्व हुआ। 1949 में भारत में कुछ समय बिताने के बाद वे फिर इंग्लैंड लौटे और कैम्ब्रिज में डॉ. जीडब्ल्यू केनर तथा प्रोफेसर एआर टॉड के साथ 1950 से 1952 तक काम किया। इसी निर्णायक प्रवास में प्रोटीन और न्यूक्लिक एसिड, दोनों के प्रति उनकी रुचि विकसित हुई।

1952 में डॉ. गॉर्डन एम श्रुम के नौकरी प्रस्ताव ने उन्हें वैंकूवर पहुंचा दिया। सीमित सुविधाओं के बावजूद शोध की पूर्ण स्वतंत्रता ही वह माहौल था, जहां खुराना और उनके सहयोगियों ने जैविक रूप से महत्वपूर्ण फॉस्फेट एस्टर और न्यूक्लिक एसिड पर काम शुरू किया। डॉ. जैक कैंपबेल की वैज्ञानिक सलाह और डॉ. गॉर्डन एम टेनर जैसे समर्पित सहयोगियों ने इस समूह को बौद्धिक और मानवीय दोनों स्तरों पर समृद्ध किया।

1960 में वे विस्कॉन्सिन विश्वविद्यालय के एंजाइम अनुसंधान संस्थान से जुड़े और अमेरिकी नागरिक बने। 1968 में प्रोफेसर मार्शल निरेनबर्ग और प्रोफेसर रॉबर्ट हॉली के साथ उन्हें चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला। यह उपलब्धि उन्हें जेनेटिक कोड की व्याख्या और प्रोटीन संश्लेषण में उसकी भूमिका के लिए मिली। 1969 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया। 1970 के पतझड़ से वे मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में जीव विज्ञान और रसायन विज्ञान के अल्फ्रेड पी स्लोमन प्रोफेसर रहे।

व्यक्तिगत जीवन में 1952 में स्विस मूल की एस्थर एलिजाबेथ सिबलर से विवाह ने खुराना को स्थिरता दी। ऐसे समय में, जब वे जन्म देश से वर्षों दूर रहकर हर जगह खुद को पराया महसूस करते थे। उनके तीन बच्चे, जूलिया एलिजाबेथ, एमिली ऐनी और डेव रॉय, उनकी जीवन यात्रा के साक्षी बने।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि वे प्रेरणा की एक मिसाल भी हैं।
RashtraPress
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

हर गोबिंद खुराना ने कौन सा पुरस्कार जीता?
हर गोबिंद खुराना को 1968 में चिकित्सा का नोबेल पुरस्कार मिला।
उनका जन्म कब हुआ था?
उनका जन्म 9 जनवरी 1922 को पंजाब प्रांत के रायपुर गांव में हुआ था।
राष्ट्र प्रेस
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