मोहन भागवत का पूर्व सैनिकों से संवाद: समाज की भूमिका पर दिया जोर
सारांश
Key Takeaways
- समाज की सशक्त भूमिका राष्ट्र निर्माण में आवश्यक है।
- अग्निवीर योजना में सुधार की गुंजाइश है।
- कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।
- संस्कार और परोपकार एक स्वस्थ समाज के लक्षण हैं।
- युवाओं के लिए शिक्षा और स्थानीय विकास की अपार संभावनाएं हैं।
देहरादून, 23 फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने उत्तराखंड प्रवास के दूसरे दिन सोमवार को देहरादून के निम्बूवाला स्थित हिमालयन सांस्कृतिक केंद्र, गढ़ी कैंट में पूर्व सैनिकों और पूर्व सेना अधिकारियों के साथ 'प्रमुख जन गोष्ठी एवं विविध क्षेत्र समन्वित संवाद कार्यक्रम' का आयोजन किया।
कार्यक्रम की शुरुआत में पूर्व मेजर जनरल गुलाब सिंह रावत, कर्नल अजय कोठियाल और कर्नल मयंक चौबे ने सरसंघचालक भागवत का स्वागत किया। इस अवसर पर सेना के नेतृत्व कर चुके 6 जनरल, वाईस एडमिरल, डी जी कॉस्ट गार्ड, ब्रिगेडियर, और 50 से अधिक कर्नल रैंक के अधिकारियों ने भाग लिया। इसके साथ ही, सैकड़ों पूर्व सैनिक जो कप्तान और हवलदार के पद पर रहे हैं, ने अपने सैन्य परिधानों में कार्यक्रम में भाग लिया।
अपने प्रमुख संबोधन में डॉ. भागवत ने कहा कि राष्ट्र के भाग्य निर्माण में समाज की केंद्रीय भूमिका होती है। उन्होंने जोर देकर कहा कि यदि समाज मजबूत होगा तो राष्ट्र की रक्षा भी सशक्त होगी। समाज के संगठित सामर्थ्य से ही प्रत्येक नागरिक को बल मिलता है, इसलिए समाज का नेतृत्व चरित्रवान और अनुशासित होना आवश्यक है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर क्रांतिकारी आंदोलनों की परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता की ज्योति कभी बुझी नहीं। द्वितीय विश्वयुद्ध के संदर्भ में विंस्टन चर्चिल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास से सीख लेना परिपक्व राष्ट्रीय चेतना का लक्षण है।
संघ के संस्थापक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार की स्मृति में उन्होंने कहा कि वे जन्मजात राष्ट्रभक्त थे, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन में निर्भीक भूमिका निभाई। उनके संपर्क में मदान मोहन मालवीय सहित कई स्वतंत्रता सेनानी रहे। आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया कि संघ का एकमात्र उद्देश्य व्यक्ति निर्माण है, चुनावी राजनीति नहीं, क्योंकि जब व्यक्ति मजबूत होता है तभी राष्ट्र मजबूत होता है। संघ बिना किसी बाहरी साधन के खड़ा हुआ और दो बार प्रतिबंध झेलने के बाद भी समाज की आत्मशक्ति के बल पर आगे बढ़ता रहा।
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में उपस्थित पूर्व सैनिकों और अधिकारियों ने राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक समरसता, युवा पीढ़ी और नीतिगत विषयों पर कई महत्वपूर्ण प्रश्न पूछे, जिनका डॉ. भागवत ने तार्किक और संतुलित ढंग से उत्तर दिया। राष्ट्रीय सुरक्षा और अग्निवीर योजना पर प्रश्न का उत्तर देते हुए उन्होंने कहा कि उत्कृष्ट नेतृत्व और सैन्य तैयारी हमेशा आवश्यक होती है। उन्होंने अग्निवीर योजना को एक प्रयोग बताते हुए कहा कि अनुभव के आधार पर इसमें सुधार और परिमार्जन की गुंजाइश पर विचार होना चाहिए।
नेपाल, बांग्लादेश, कश्मीर और पड़ोसी देशों के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि ये सभी ऐतिहासिक रूप से एक ही सांस्कृतिक भू-भाग का हिस्सा रहे हैं। कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है और भारत के विरुद्ध चल रही विरोधी मुहिमों के प्रति एक सतर्क और दृढ़ नीति आवश्यक है।
हिंदू पहचान और सामाजिक समरसता पर उन्होंने कहा कि भारतीय दृष्टि जड़-चेतन को अपना मानती है और 'वसुधैव कुटुंबकम्' की भावना इसका मूल है। धर्म ही मानवता और समाज की धारणा करने वाला तत्व है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हिंदू विचार उदार और समावेशी है। बिना किसी परिवर्तन के कोई भी व्यक्ति हिंदू समाज में सम्मिलित हो सकता है। मंदिर, जल स्रोत और श्मशान जैसे सार्वजनिक संसाधन सभी हिंदुओं के लिए समान रूप से खुले होने चाहिए।
सोशल मीडिया पर वैचारिक कटुता के प्रश्न पर उन्होंने कहा कि कटुता और वैमनस्य के स्थान पर शास्त्रार्थ और सार्थक संवाद की परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा। जमीनी स्तर पर सीधे संवाद और फीडबैक लेकर ही नीतियां प्रभावी बनती हैं। भ्रष्टाचार और चरित्र निर्माण पर उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार केवल व्यवस्था की नहीं बल्कि नियत की समस्या है। बच्चों में संस्कार, कमाई में बचत और समाज के लिए वितरण की भावना विकसित करना राष्ट्र निर्माण का वास्तविक आधार है। स्वार्थ से ऊपर उठकर परोपकार में आनंद खोजने की प्रवृत्ति ही एक स्वस्थ समाज का लक्षण है।
युवा पीढ़ी, पलायन और स्थानीय विकास के प्रश्न पर आरएसएस प्रमुख ने कहा कि शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय उद्यमिता के क्षेत्रों में अपार संभावनाएं हैं। गढ़वाल जैसे पर्वतीय क्षेत्रों में पलायन रोकने के लिए विशेष और सुनियोजित प्रयास आवश्यक हैं। समान नागरिक संहिता को उन्होंने राष्ट्रीय एकता का एक महत्वपूर्ण साधन बताया और कहा कि इससे सामाजिक विवाद कम होंगे। आरक्षण के प्रश्न पर उन्होंने धैर्य और सामाजिक सहमति की आवश्यकता पर बल दिया। जनसंख्या असंतुलन के मुद्दे पर उन्होंने मतांतरण, घुसपैठ और जन्मदर को कारण बताते हुए कहा कि इस पर समग्र और दूरदर्शी नीति बनाना समय की मांग है।
उपस्थित पूर्व सैनिकों से आह्वान करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि सीमाओं पर लड़ने वाले सैनिकों के साथ-साथ समाज में भी सेवा और संघर्ष की उतनी ही आवश्यकता है। उन्होंने संघ के देशभर में सक्रिय 1 लाख 30 हजार से अधिक सेवा प्रकल्पों से जुड़ने का आग्रह किया और कहा कि इस शताब्दी वर्ष में इस सेवा यज्ञ में प्रत्येक पूर्व सैनिक की भागीदारी अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।