मोहन भागवत का संदेश: दया और करुणा को भूलने से बढ़ रहे हैं संघर्ष
सारांश
Key Takeaways
- दयालुता और करुणा का अभाव संघर्ष का कारण है।
- शांति और एकता की आवश्यकता है।
- अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं युद्ध रोकने में सफल नहीं हो पाई हैं।
- विविधता में एकता का महत्व है।
- सत्य और करुणा का सम्मान करना चाहिए।
जयपुर, 6 मार्च (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने शुक्रवार को कहा कि आज के लोग दयालुता और करुणा को भुलाते जा रहे हैं, जिसके कारण दुनिया में युद्ध और संघर्ष लगातार बने हुए हैं।
जयपुर में एक सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, "आज की दुनिया में शांति, एकता और दयालुता की बहुत आवश्यकता है। अगर लोग एक-दूसरे के प्रति करुणा और समझ बनाए रखें, तो कई संघर्ष अपने आप समाप्त हो सकते हैं।"
उन्होंने युद्ध रोकने के लिए बनाई गई अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि पहले विश्व युद्ध के बाद राष्ट्रों के संघटन की स्थापना की गई थी ताकि भविष्य में युद्धों को रोका जा सके, लेकिन यह संस्था अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो पाई।
मोहन भागवत ने कहा, "दूसरे विश्व युद्ध के बाद यूनाइटेड नेशंस की स्थापना हुई। लेकिन, आज भी दुनिया के कई हिस्सों में युद्ध जारी हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि यह संस्था भी युद्धों को रोकने में पूरी तरह सफल नहीं हो सकी।"
उन्होंने कहा, "लोग दयालुता को इसलिए भूल रहे हैं क्योंकि वे सत्य को भूल गए हैं। हम भले ही अलग-अलग दिखाई दें, लेकिन वास्तव में हम सब एक हैं। जब तक यह समझ लोगों में नहीं आएगी, तब तक संघर्ष और युद्ध चलते रहेंगे।"
इस दौरान उन्होंने पार्श्वनाथ जैन मंदिर में पूजा-अर्चना की और ऐतिहासिक जिनभद्र सूरी ज्ञान-भंडार का दौरा किया, जहां उन्होंने दादा गुरुदेव की पवित्र चादर के दर्शन किए।
इसके बाद वे डेडानसर मेला मैदान में आयोजित तीन दिन के चादर महोत्सव के मुख्य कार्यक्रम में शामिल हुए। मोहन भागवत ने विविधता में एकता का उल्लेख करते हुए कहा कि भिन्न-भिन्न धर्म और पंथ अंततः समान मूल्यों की शिक्षा देते हैं।
इस मौके पर उन्होंने दादा गुरुदेव की स्मृति में एक स्मारक सिक्का और विशेष डाक टिकट जारी किया। साथ ही 'दादा गुरुदेव' नाम की एक पुस्तक का भी विमोचन किया। उन्होंने कहा, "रास्ते भले ही अलग हों, लेकिन मंजिल एक ही होती है।" इसे समझाने के लिए उन्होंने नदियों का उदाहरण दिया और कहा कि अलग-अलग दिशाओं से बहने वाली नदियां अंततः समुद्र में ही मिलती हैं।
विविधता के विचार को समझाते हुए उन्होंने कहा कि सत्य बहुत व्यापक होता है और उसे किसी एक दृष्टिकोण तक सीमित नहीं किया जा सकता। एक सरल उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि मनुष्य सात रंग देख सकता है, जबकि कुत्ते या पक्षियों जैसे कई जीव कम रंग देख पाते हैं। लेकिन, हर कोई अपने-अपने तरीके से उसी दुनिया को देखता और समझता है।
उन्होंने कहा कि सत्य सार्वभौमिक और शाश्वत है। हमें विविधता का सम्मान करना चाहिए, लेकिन अपनी एकता को कभी नहीं भूलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि यही विचार लंबे समय से भारत की सांस्कृतिक सोच की पहचान रहा है।
यह उत्सव लगभग 871 वर्षों के अंतराल के बाद आयोजित किया जा रहा है। यह जैन धर्म के पूजनीय गुरु से जुड़ी पवित्र चादर की विधिवत प्रतिष्ठा और आम लोगों के दर्शन का अवसर है।
इस अवसर पर पू. खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभ सूरीश्वरजी महाराज ने भी लोगों को संबोधित किया। उन्होंने कहा, "दादा गुरुदेव ने समाज को धर्म और जीवन जीने की सही राह दिखाई। उनकी चादर का यह उत्सव लोगों के दिलों को भक्ति से भर देता है। उनके आदर्शों और संदेश को पूरी दुनिया तक पहुंचना चाहिए।"
तीन दिन तक चलने वाला यह चादर महोत्सव भव्य समापन के साथ खत्म होगा। यह जैन समुदाय के इतिहास में बहुत दुर्लभ आध्यात्मिक अवसर माना जा रहा है, जो शांति, एकता और करुणा के संदेश को और मजबूत करेगा।