हिमाचल के सोमदत्त बट्टू: लोकसंगीत के सच्चे साधक की अद्भुत यात्रा
सारांश
Key Takeaways
- सोमदत्त बट्टू का जन्म 11 अप्रैल 1938 को हुआ था।
- उन्होंने लोकसंगीत को शास्त्रीय संगीत के साथ जोड़कर प्रस्तुत किया।
- उन्हें 2018 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला।
- उनकी संगीत यात्रा ने नई पीढ़ी को प्रेरित किया।
- उन्हें 2024 में पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
नई दिल्ली, 10 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। 11 अप्रैल की तारीख केवल एक सामान्य दिन नहीं है, बल्कि यह हिमाचल की धरती से उभरे एक अद्वितीय सुर साधक का जन्मदिन है, जिन्होंने लोकसंगीत को न केवल घर-घर बल्कि देश-विदेश में भी पहचान दिलाई। यहां हम चर्चा कर रहे हैं हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले के जसूर गांव में जन्मे प्रसिद्ध संगीतकार सोमदत्त बट्टू की, जिन्हें आज लोग हिमाचल गौरव के रूप में जानते हैं।
सोमदत्त बट्टू का जन्म 11 अप्रैल 1938 को हुआ था। उनके परिवार में संगीत का माहौल था, क्योंकि उनके पिता स्वयं एक गायक थे। इस संगीत प्रेमी वातावरण में बड़े होते हुए, सोमदत्त ने बहुत कम उम्र में लोकसंगीत की गहराइयों को समझना और अनुभव करना शुरू कर दिया। गांव की चौपालों से लेकर धार्मिक आयोजनों तक, जहां भी लोकधुनें गूंजती थीं, वहीं से उनके भीतर संगीत की नींव मजबूत होती गई।
धीरे-धीरे, उन्होंने शास्त्रीय संगीत की ओर भी कदम बढ़ाया और ग्वालियर घराने के श्रीकुंज लाल शर्मा तथा पटियाला घराने के कुंदनलाल शर्मा से विधिपूर्वक संगीत की शिक्षा ग्रहण की। इसके बाद, इंदौर घराने के महान उस्ताद अमीर खान के सानिध्य में रहकर उन्होंने अपनी गायकी को और अधिक निखारा। इन तीनों परंपराओं का संगम उनकी संगीत शैली की सबसे बड़ी ताकत बना।
सोमदत्त बट्टू की विशेषता यह रही कि उन्होंने कभी भी लोकसंगीत को शास्त्रीय संगीत से अलग नहीं माना, बल्कि दोनों को एक-दूसरे का पूरक समझा। यही कारण है कि उनकी प्रस्तुतियों में शास्त्रीय रागों की गंभीरता के साथ-साथ हिमाचली लोकधुनों की सरलता और अपनापन भी स्पष्ट रूप से झलकता है। उन्होंने हिमाचल प्रदेश की कई लोकसंगीत शैलियों को संजोने, संरक्षित करने और नई पीढ़ी तक पहुंचाने का कार्य किया।
वे आकाशवाणी और दूरदर्शन के प्रमुख कलाकार रहे हैं और उनके कार्यक्रमों को देशभर में सुना और सराहा गया। उन्होंने हिमाचल की लोकधुनों पर आधारित कई कार्यक्रम तैयार किए, जो लोगों को अपनी जड़ों से जोड़ने में सहायक रहे। केवल देश में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी उन्होंने कई प्रतिष्ठित संगीत समारोहों में हिमाचल का प्रतिनिधित्व किया, जिससे भारतीय लोकसंगीत की छवि को मजबूती मिली।
सोमदत्त बट्टू केवल एक गायक नहीं, बल्कि एक उत्कृष्ट लेखक और शोधकर्ता भी रहे हैं। उन्होंने लोकसंगीत पर गहन अध्ययन किया और उसकी परंपराओं को लिखित रूप में भी संजोया। उनके योगदान को देखकर उन्हें कई बड़े सम्मान प्राप्त हुए हैं। उन्हें 2018 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इसके अलावा, उन्हें 1975 में संगीत कला रत्न, 2001 में डॉ. यशवंत सिंह परमार पुरस्कार, 2012 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड, 2014 में संगीत मार्तंड पुरस्कार और कई अन्य प्रतिष्ठित सम्मान भी प्राप्त हुए। उनके जीवनभर की संगीत साधना के लिए उन्हें 2024 में पद्मश्री से नवाजा गया, जिसने उनकी उपलब्धियों को राष्ट्रीय पहचान दी।