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इंटेलिजेंट वारफेयर: भारत को गैर-परमाणु रणनीतिक क्षमताएँ विकसित करनी होंगी: जनरल अनिल चौहान

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इंटेलिजेंट वारफेयर: भारत को गैर-परमाणु रणनीतिक क्षमताएँ विकसित करनी होंगी: जनरल अनिल चौहान

सारांश

बदलते युद्ध परिदृश्य में, जनरल अनिल चौहान ने कहा है कि भारत को इंटेलिजेंट वारफेयर की दिशा में कदम बढ़ाने की आवश्यकता है। यह संगोष्ठी सशस्त्र बलों की नई रणनीतियों और तकनीकी समन्वय पर केंद्रित थी।

मुख्य बातें

इंटेलिजेंट वारफेयर भारतीय सशस्त्र बलों के लिए आवश्यक है।
गैर-परमाणु रणनीतिक क्षमताएँ विकसित करनी होंगी।
मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस से आगे बढ़कर एआरएडीओ की दिशा में जाना जरूरी है।
भविष्य के युद्ध में तकनीक का समन्वय महत्वपूर्ण होगा।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना आवश्यक है।

नई दिल्ली, २५ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। वर्तमान समय में युद्ध की परिभाषा तेजी से बदल रही है। अब लड़ाई केवल ज़मीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि यह ‘सिंथेटिक’ और ‘कॉग्निटिव’ यानी डिजिटल क्षेत्रों में भी फैल चुकी है। इस संदर्भ में, भारतीय सशस्त्र बलों को पारंपरिक नेटवर्क-केंद्रित संचालन से आगे बढ़कर ‘इंटेलिजेंट वारफेयर’ की ओर मजबूती से कदम बढ़ाने की आवश्यकता है।

यह जानकारी चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ जनरल (सीडीएस) अनिल चौहान ने बुधवार को साझा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत को परमाणु हथियारों के अलावा गैर-परमाणु रणनीतिक प्रतिरोधक क्षमता का विकास करना आवश्यक है। इससे हम किसी भी स्तर पर बढ़ती आक्रामकता का सामना कर सकेंगे और जीत सुनिश्चित कर सकेंगे।

सीडीएस चौहान ने सिकंदराबाद स्थित कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट (सीडीएम) में आयोजित वार्षिक संगोष्ठी में इस विषय पर चर्चा की। संगोष्ठी का शीर्षक ‘मल्टी-डोमेन इंटीग्रेटेड टेक्नोलॉजिकली-एम्पावर्ड रेजिलिएंट आर्म्ड फोर्सेस (मित्र)’ था।

उन्होंने कहा कि भारतीय सशस्त्र बलों को अब केवल मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस (एमडीओ) तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें ‘ऑल रियल्म ऑल डोमेन ऑपरेशंस (एआरएडीओ)’ की दिशा में आगे बढ़ना होगा।

सीडीएस के अनुसार, भविष्य के युद्ध में संपर्क और बिना संपर्क वाले, घातक, पुराने और नए सभी प्रकार के क्षेत्रों का समन्वय होगा। इसे सैन्य मामलों में तीसरी क्रांति के रूप में देखा जा सकता है, जो ‘कन्वर्जेंस वारफेयर’ पर आधारित है। यह संगोष्ठी ‘मित्र’ इस बात को उजागर करती है कि बदलते भू-राजनीतिक और तकनीकी परिदृश्य में सेना की भूमिका और युद्ध की रणनीतियाँ किस तरह विकसित हो रही हैं।

इस संगोष्ठी में वरिष्ठ रक्षा अधिकारी, शिक्षाविद, उद्योग के प्रतिनिधि और रणनीतिक विशेषज्ञ शामिल हुए। यहां समकालीन संघर्षों से मिलने वाले सबकों पर चर्चा की गई। इसका उद्देश्य रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता और संरचनात्मक सुधारों को बढ़ावा देना था। मित्र के तहत ऐसी सशस्त्र सेनाओं के निर्माण पर जोर दिया गया जो मल्टी-डोमेन दृष्टिकोण रखती हों। एक दृढ़ संकल्प वाली सेना जो एकीकृत कार्रवाई में सक्षम हो और तकनीक-सशक्त क्रियान्वयन करती हो। इसका व्यापक उद्देश्य भविष्य की चुनौतियों का प्रबंधन और प्रशासन करने के लिए समग्र राष्ट्रीय शक्ति का विकास करना है।

गौरतलब है कि दिसंबर १९७० में स्थापित कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट देश का प्रमुख त्रि-सेवा संस्थान है। यह संस्थान सैन्य नेतृत्व को आधुनिक प्रबंधन सिद्धांतों और सर्वोत्तम प्रथाओं में प्रशिक्षित करता है। पिछले वर्षों में यहां रणनीतिक चुनौतियों, आत्मनिर्भरता, भू-राजनीतिक शक्ति संतुलन और नेतृत्व परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की जा चुकी है। इस बार की संगोष्ठी ने स्पष्ट संकेत दिया है कि भारतीय सशस्त्र बल आने वाले समय में सिर्फ ताकत के बल पर नहीं, बल्कि तकनीक, बुद्धिमत्ता और समन्वित रणनीति के आधार पर भविष्य की चुनौतियों का सामना करने की तैयारी कर रहे हैं।

संपादकीय दृष्टिकोण

बल्कि भविष्य की चुनौतियों का भी सामना करने में सक्षम बनाएगा।
RashtraPress
28 जुलाई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

इंटेलिजेंट वारफेयर क्या है?
इंटेलिजेंट वारफेयर एक नई रणनीति है जो डिजिटल और तकनीकी क्षेत्रों में युद्ध को शामिल करती है।
भारत को गैर-परमाणु रणनीतिक क्षमताएँ क्यों विकसित करनी चाहिए?
गैर-परमाणु रणनीतिक क्षमताएँ बढ़ती आक्रामकता का सामना करने में मदद करेंगी।
मल्टी-डोमेन ऑपरेशंस क्या है?
यह एक रणनीतिक दृष्टिकोण है जो विभिन्न क्षेत्रों में संचालन को समन्वित करता है।
इस संगोष्ठी का विषय क्या था?
संगोष्ठी का शीर्षक 'मल्टी-डोमेन इंटीग्रेटेड टेक्नोलॉजिकली-एम्पावर्ड रेजिलिएंट आर्म्ड फोर्सेस' था।
कॉलेज ऑफ डिफेंस मैनेजमेंट कब स्थापित हुआ था?
यह कॉलेज दिसंबर 1970 में स्थापित हुआ था।
राष्ट्र प्रेस
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