क्या झारखंड के आदिवासी मुद्दों पर केंद्रीय मंत्री से मिला प्रतिनिधिमंडल?

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क्या झारखंड के आदिवासी मुद्दों पर केंद्रीय मंत्री से मिला प्रतिनिधिमंडल?

सारांश

झारखंड के आदिवासी समुदाय की समस्याओं को लेकर केंद्रीय मंत्री जुएल ओराम से आदिवासी छात्र संघ का प्रतिनिधिमंडल मिला। उन्होंने शिक्षा, आरक्षण और विकास की चुनौतियों पर चर्चा की और समाधान की मांग की। क्या ये कदम आदिवासियों के लिए बदलाव ला पाएंगे?

Key Takeaways

  • आदिवासी समुदाय की समस्याएं गंभीर हैं।
  • शिक्षा और रोजगार में सुधार की आवश्यकता है।
  • सरकार को त्वरित कदम उठाने चाहिए।
  • आरक्षण के प्रावधानों का प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक है।
  • अंतरराज्यीय विस्थापन की समस्या पर ध्यान देना चाहिए।

रांची, 30 नवंबर (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड के आदिवासी समुदाय से संबंधित मुद्दों पर आदिवासी छात्र संघ के एक प्रतिनिधिमंडल ने रविवार को केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम से मुलाकात की और उन्हें एक विस्तृत ज्ञापन प्रस्तुत किया। संघ ने रांची में एक कार्यक्रम के दौरान केंद्रीय मंत्री का ध्यान छात्रवृत्ति, आरक्षण, शिक्षा और विकास से जुड़ी समस्याओं की ओर खींचा और आवश्यक कदम उठाने का अनुरोध किया।

ज्ञापन में कहा गया है कि देश के कुल खनिज भंडार का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा झारखंड में है, फिर भी राज्य की करीब 26.3 प्रतिशत आदिवासी आबादी शिक्षा, रोजगार और बजटीय प्रावधानों में अपने उचित हिस्से से वंचित है। प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि विभिन्न विभागों में अनुसूचित जनजाति के लिए स्वीकृत आरक्षित पद वर्षों से खाली हैं और पदोन्नति में आरक्षण के प्रावधान भी प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रहे हैं। इससे योग्य आदिवासी युवाओं को न तो नौकरी मिल रही है और न ही पदोन्नति के अवसर।

संघ ने ट्राइबल रिसर्च इंस्टीट्यूट, झारखंड के सर्वे का उल्लेख करते हुए कहा कि 5000 घरों के अध्ययन में आदिवासी परिवारों की औसत वार्षिक आय मात्र 73,000 रुपए पाई गई। सर्वे के अनुसार 45 प्रतिशत आदिवासी पुरुष और 63 प्रतिशत महिलाएं निरक्षर हैं, 25 प्रतिशत परिवार भोजन संकट का सामना कर रहे हैं, जबकि 50 प्रतिशत पुरुष और 53 प्रतिशत महिलाएं कुपोषण की स्थिति में हैं। चिंताजनक तथ्य यह है कि केवल 16 प्रतिशत छात्र ही मैट्रिक के बाद की पढ़ाई कर पाते हैं।

ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया गया है कि केंद्र और राज्य सरकार को इन समस्याओं का समाधान प्राथमिकता के आधार पर करना चाहिए। प्रतिनिधिमंडल ने मांग की कि केंद्र-राज्य 75:25 अनुपात के तहत लंबित पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति तुरंत जारी की जाए। इसके साथ ही पेसा एक्ट 1996 और मेसा कानून को झारखंड में प्रभावी रूप से लागू किया जाए।

संघ ने कहा कि 2011 की जनगणना में दर्ज 18.6 प्रतिशत अंतरराज्यीय विस्थापन की समस्या को देखते हुए केंद्र सरकार को ठोस नीति बनानी चाहिए, ताकि आदिवासी छात्रों और युवाओं को अपने ही राज्य में सम्मानजनक अवसर मिल सकें।

प्रतिनिधिमंडल में संघ के केंद्रीय अध्यक्ष सुशील उरांव, कोषाध्यक्ष जलेशवर भगत, रांची विश्वविद्यालय इकाई के अध्यक्ष मनोज उरांव, विवेक तिर्की, प्रकाश भगत, मनीष उरांव, सुलेखा कुजूर, कार्तिक उरांव, दिनेश उरांव, और रंजीत उरांव सहित कई प्रतिनिधि शामिल थे।

Point of View

यह कहना आवश्यक है कि आदिवासी समुदाय की समस्याओं को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। सरकार का कर्तव्य है कि वह इन मुद्दों पर त्वरित समाधान प्रदान करे ताकि समाज के इस महत्वपूर्ण हिस्से को समान अवसर मिल सकें।
NationPress
30/11/2025

Frequently Asked Questions

आदिवासी छात्रों को कौनसी समस्याएं हैं?
आदिवासी छात्रों को शिक्षा, रोजगार और आरक्षण संबंधित कई समस्याएं हैं, जिससे वे अपने अधिकारों से वंचित हैं।
केंद्र सरकार क्या कदम उठा सकती है?
केंद्र सरकार को छात्रवृत्तियों और आरक्षण में तेजी लाने के लिए ठोस नीतियाँ बनानी चाहिए।
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