क्या झारखंड हाईकोर्ट ने नगर निगमों में मेयर पद के आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी?

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क्या झारखंड हाईकोर्ट ने नगर निगमों में मेयर पद के आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी?

सारांश

झारखंड हाईकोर्ट ने नगर निगमों के मेयर पद के आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी है। यह निर्णय नगर निगमों के वर्गीकरण और आरक्षण प्रक्रिया के वैधता पर केंद्रित था। जनहित याचिका में 2011 की जनगणना के आंकड़ों की अनदेखी का आरोप लगाया गया था।

मुख्य बातें

झारखंड हाईकोर्ट ने नगर निगमों में मेयर पद के आरक्षण को चुनौती देने वाली याचिका खारिज की।
सरकार की नीति के तहत नगर निगमों का वर्गीकरण किया गया था।
2011 की जनगणना के आंकड़ों की अनदेखी का आरोप लगाया गया।
चुनाव प्रक्रिया में यह निर्णय महत्वपूर्ण है।

रांची, 27 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य में नगर निगमों को दो वर्गों में विभाजित करने और मेयर पद के आरक्षण की व्यवस्था को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। मंगलवार को चीफ जस्टिस एमएस सोनक और जस्टिस राजेश शंकर की खंडपीठ ने शांतनु कुमार चंद्र की ओर से दायर जनहित याचिका पर यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।

याचिकाकर्ता ने राज्य सरकार की उस नीति को चुनौती दी थी, जिसके तहत नगर निकाय चुनाव के लिए झारखंड के कुल नौ नगर निगमों को दो वर्गों, वर्ग ‘क’ और वर्ग ‘ख’ में विभाजित किया गया है। सरकार की अधिसूचना के अनुसार, वर्ग ‘क’ में रांची और धनबाद नगर निगम को शामिल किया गया है, जबकि राज्य के शेष अन्य नगर निगमों को वर्ग ‘ख’ में रखा गया है।

इसी वर्गीकरण के आधार पर मेयर पद के आरक्षण का निर्धारण किया गया था। याचिका में कहा गया था कि सरकार ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों की अनदेखी करते हुए आरक्षण नीति लागू की है। प्रार्थी के अनुसार, 2011 की जनगणना में धनबाद जिले में अनुसूचित जाति की आबादी करीब दो लाख बताई गई है, ऐसे में यहां मेयर पद अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होना चाहिए था।

इसके विपरीत, सरकार की नीति के तहत धनबाद में मेयर पद को अनारक्षित घोषित कर दिया गया। वहीं दूसरी ओर, गिरिडीह नगर निगम में अनुसूचित जाति की आबादी महज लगभग 30 हजार होने के बावजूद वहां मेयर पद को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित कर दिया गया। याचिकाकर्ता ने इसे संविधान के समानता और न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ बताते हुए कोर्ट से हस्तक्षेप की मांग की थी।

इस मामले में राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजीव रंजन और अपर महाधिवक्ता सचिन कुमार ने पक्ष रखा। सरकार ने दलील दी कि नगर निगमों का वर्गीकरण और आरक्षण पूरी तरह वैधानिक प्रक्रिया के तहत और संबंधित नियमों के अनुसार किया गया है। सभी पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट की खंडपीठ ने याचिका को खारिज कर दिया। कोर्ट के इस फैसले के बाद राज्य में नगर निकाय चुनाव कराने का रास्ता साफ हो गया है।

संपादकीय दृष्टिकोण

झारखंड हाईकोर्ट का यह निर्णय राज्य में राजनीतिक प्रक्रिया को मजबूत करेगा। हालांकि, यह आवश्यक है कि आरक्षण नीति को निष्पक्षता और समानता के सिद्धांतों पर आधारित किया जाए। सरकार को भविष्य में जनगणना के आंकड़ों का सही उपयोग करना चाहिए।
RashtraPress
13 मई 2026

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

झारखंड हाईकोर्ट ने याचिका क्यों खारिज की?
हाईकोर्ट ने यह निर्णय लिया कि नगर निगमों का वर्गीकरण और आरक्षण वैधानिक प्रक्रिया के तहत किया गया है।
क्या याचिकाकर्ता ने जनगणना के आंकड़ों का उल्लेख किया था?
हाँ, याचिकाकर्ता ने 2011 की जनगणना के आंकड़ों की अनदेखी का आरोप लगाया था।
इस फैसले का राजनीतिक प्रभाव क्या होगा?
इस निर्णय से नगर निकाय चुनाव का रास्ता साफ हो गया है, जो राजनीतिक स्थिरता को बढ़ावा देगा।
राष्ट्र प्रेस
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