जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड चेयरपर्सन दरख्शां अंद्राबी ने शुक्रवार उपदेश एकरूपता के आरोप किए खारिज
सारांश
मुख्य बातें
जम्मू-कश्मीर वक्फ बोर्ड की चेयरपर्सन दरख्शां अंद्राबी ने मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 को श्रीनगर में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट किया कि बोर्ड ने पूरे केंद्र शासित प्रदेश की मस्जिदों में शुक्रवार के उपदेशों (खुत्बे) को एकसमान बनाने का कोई निर्देश जारी नहीं किया है। उन्होंने इन रिपोर्टों को निराधार बताते हुए कहा कि धार्मिक विद्वान और उपदेशक पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
विवाद की पृष्ठभूमि
यह विवाद तब उठा जब वक्फ से जुड़ी मस्जिदों और धार्मिक संस्थानों में शुक्रवार के उपदेशों के लिए एक समान विषय (कॉमन थीम) लागू करने के एक प्रस्ताव की रिपोर्टें सामने आईं। इस खबर के सामने आते ही राजनीतिक और धार्मिक नेताओं में तीखी प्रतिक्रिया देखी गई।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक समाचार रिपोर्ट साझा करते हुए मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा, 'यह मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखल देने की भारतीय जनता पार्टी (BJP) की एक ऐसी कोशिश है जिसे मंजूर नहीं किया जा सकता और इसे किसी भी हाल में स्वीकार नहीं किया जाएगा।' उन्होंने आगे कहा, 'भाजपा की ओर से नियुक्त चेयरपर्सन को अपने आकाओं को खुश करने की इस गलत कोशिश को तुरंत रोकना चाहिए।'
अंद्राबी का स्पष्टीकरण
इन आरोपों पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए दरख्शां अंद्राबी ने कहा, 'कोई आदेश नहीं है। कहीं भी कोई आदेश नहीं है।' उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि न तो वे स्वयं और न ही बोर्ड का कोई अधिकारी शुक्रवार के उपदेशों के विषयों को निर्धारित करने का अधिकार रखता है। उनके अनुसार, यह फैसला पूर्णतः स्वतंत्र धार्मिक विद्वानों और उपदेशकों का होता है।
उन्होंने कहा, 'न तो दरख्शां अंद्राबी कोई फैसला ले सकती हैं और न ही मेरा कोई अधिकारी। यह स्वतंत्र विद्वानों, हमारे उपदेशकों और उपदेश देने वालों का फैसला है कि हमें समाज की बुराइयों को दूर करने की कोशिश करनी चाहिए।'
पहल का असली मकसद
अंद्राबी ने स्पष्ट किया कि इस पहल का उद्देश्य अहम सामाजिक मुद्दों की ओर ध्यान आकर्षित करना था — विशेष रूप से युवा पीढ़ी को प्रभावित करने वाले मुद्दे, जैसे नशीली दवाओं का सेवन, पारिवारिक समस्याएँ, आत्महत्या और मानसिक आघात।
उन्होंने बोर्ड से जुड़े धार्मिक विद्वानों की भूमिका की तुलना डॉक्टरों, इंजीनियरों और शिक्षकों से करते हुए कहा कि ये विद्वान भी अपने-अपने क्षेत्र में सामाजिक बुराइयों को दूर करने में योगदान दे सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि प्रस्तावित कोर कमेटी में केवल धार्मिक नेता शामिल होंगे और वे स्वयं उसकी सदस्य नहीं होंगी।
राजनीतिक नेताओं से अपील
दरख्शां अंद्राबी ने राजनीतिक नेताओं से अपील की कि वे सामाजिक बुराइयों को दूर करने की कोशिशों का विरोध करने के बजाय जमीनी स्तर पर आम लोगों को प्रभावित करने वाले मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करें। उन्होंने कहा, 'हमारे धार्मिक विद्वान जो भी चाहें, वे अपने तरीके से करेंगे। इसमें कोई दखलंदाजी नहीं है।'
गौरतलब है कि यह मामला ऐसे समय में उभरा है जब जम्मू-कश्मीर में धार्मिक और राजनीतिक मामलों को लेकर संवेदनशीलता पहले से ही ऊँची बनी हुई है। आगे यह देखना होगा कि क्या बोर्ड सामाजिक जागरूकता अभियान को स्वैच्छिक आधार पर आगे बढ़ाता है या यह विवाद किसी नीतिगत बदलाव की दिशा में जाता है।