क्या जेएनयू छात्रसंघ के पदाधिकारी विवादित नारेबाजी में शामिल थे? : एबीवीपी नेता मनीष चौधरी
सारांश
Key Takeaways
- जेएनयू में विवादित नारेबाजी हुई।
- एबीवीपी ने तीव्र प्रतिक्रिया दी।
- प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के खिलाफ नारे लगाए गए।
- सुप्रीम कोर्ट ने जमानत याचिका खारिज की।
- कठोर कार्रवाई की मांग की गई है।
नई दिल्ली, 6 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। दिल्ली के जेएनयू कैंपस में सोमवार को लगे विवादित नारों को लेकर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) ने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। जेएनयू के एबीवीपी यूनिट ने यह स्पष्ट किया है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के खिलाफ जो नारे लगाए गए, वह पूरी तरह से गलत और अस्वीकार्य हैं।
उनका आरोप है कि इसमें केवल कुछ छात्र ही नहीं, बल्कि जेएनयू छात्रसंघ के पदाधिकारी, जैसे कि अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, सचिव और पूर्व सदस्य भी शामिल थे। इसमें शामिल लोग विद्यार्थी नहीं, बल्कि देश के खिलाफ मानसिकता रखने वाले हैं।
यह विवादित नारे उस समय लगे जब सुप्रीम कोर्ट ने 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में पूर्व जेएनयू छात्रों उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका खारिज की थी।
एबीवीपी का कहना है कि लगभग 30-40 छात्र, जो डीएसएफ, एआईएसए और एसएफआई जैसे वामपंथी संगठनों से जुड़े थे, ने 'गुरिल्ला ढाबा' में जमा होकर विरोध-प्रदर्शन किया और सरकार के खिलाफ नारे लगाए।
एबीवीपी के नेता मनीष चौधरी ने कहा कि जेएनयू के पदाधिकारियों ने छात्रों को साधारण मुद्दों के बहाने इकट्ठा किया और फिर उन्हें सुप्रीम कोर्ट के फैसले की जानकारी दी और विवादित नारे लगाने के लिए उकसाया। उन्होंने यह भी बताया कि कुछ छात्रों ने एबीवीपी और आरएसएस के खिलाफ भी नारे लगाए। उनका कहना है कि ऐसा करना भारत के सामाजिक सामंजस्य और देश की प्रगति के प्रयासों को हानि पहुंचाता है।
उन्होंने प्रशासन और पुलिस से मांग की कि जो भी इसमें शामिल हैं, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाए। उनका कहना है कि जेएनयू में जो लोग उमर खालिद और शरजील इमाम का समर्थन कर रहे हैं, उन्हें भी जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए।
एबीवीपी ने पुलिस और विश्वविद्यालय प्रशासन से तत्काल कदम उठाने और ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की मांग की है। उनका कहना है कि इस प्रकार के नारे और विरोध-प्रदर्शन देश के माहौल को खराब करते हैं और देश के कानून और संविधान का अपमान करते हैं।