कक्षा 8 की किताब में न्यायपालिका के अध्याय पर एनसीईआरटी ने लगाया रोक
सारांश
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नई दिल्ली, २५ फरवरी (राष्ट्र प्रेस)। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) ने २४ फरवरी को कक्षा ८ की सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक जारी की थी। हालांकि, इस पुस्तक के एक अध्याय में कुछ असंगत बातें पाई गईं, जो स्वीकार्य नहीं थीं। यह अध्याय 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' शीर्षक से है और पृष्ठ १२५ से १४२ तक फैला हुआ है। इस मुद्दे के उजागर होने के बाद, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय ने तुरंत निर्देश दिया कि अगली सूचना तक इस किताब का वितरण रोक दिया जाए। एनसीईआरटी ने इस आदेश का पालन करते हुए किताब की आपूर्ति पर रोक लगा दी है。
यह उल्लेखनीय है कि इस अध्याय पर कई न्यायधीशों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने कड़ी आपत्ति जताई थी। एनसीईआरटी ने स्पष्ट किया है कि वह न्यायपालिका का अत्यधिक सम्मान करती है और इसे संविधान और जनहित के रक्षक के रूप में मानती है।
एनसीईआरटी के अनुसार, जो त्रुटि हुई है, वह अनजाने में हुई है। किसी भी संस्था की गरिमा को कम करने का इरादा नहीं था। अब इस अध्याय को फिर से लिखा जाएगा और इसमें संबंधित अधिकारियों से परामर्श लिया जाएगा। सुधारित पुस्तक शैक्षणिक सत्र २०२६-२७ की शुरुआत में विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जाएगी।
एनसीईआरटी ने इस गलती पर खेद व्यक्त करते हुए माफी भी मांगी है और कहा है कि भविष्य में ऐसी गलतियों से बचने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा।
बुधवार की रात, एनसीईआरटी ने एक बयान जारी करते हुए कहा कि राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद द्वारा कक्षा ८ की सामाजिक विज्ञान की नई पुस्तक जारी की गई थी। पुस्तक के अध्याय ४ 'हमारे समाज में न्यायपालिका की भूमिका' में कुछ अनुचित सामग्री और निर्णय संबंधी त्रुटियां पाए जाने के बाद उसके वितरण पर तुरंत रोक लगा दी गई है।
जागरण है कि न्यायपालिका ने इस मुद्दे पर संज्ञान लिया है। गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अदालत में इस विषय पर सुनवाई होनी तय है। इस बीच, स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग, शिक्षा मंत्रालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए निर्देश दिया कि अगली सूचना तक पुस्तक की आपूर्ति और वितरण स्थगित रखा जाए।
एनसीईआरटी ने मंत्रालय के निर्देशों का पालन करते हुए पुस्तक का वितरण रोक दिया है। परिषद का कहना है कि वह भारतीय न्यायपालिका को सर्वोच्च सम्मान देती है और इसे संविधान का संरक्षक तथा मौलिक अधिकारों का रक्षक मानती है।
एनसीईआरटी के अनुसार, संबंधित अध्याय में जो त्रुटि हुई है, वह अनजाने में हुई है। किसी भी संवैधानिक संस्था की गरिमा को ठेस पहुंचाने का कोई उद्देश्य नहीं था।
परिषद ने यह भी दोहराया कि नई पुस्तकों का उद्देश्य विद्यार्थियों में संवैधानिक साक्षरता को सुदृढ़ करना, संस्थाओं के प्रति सम्मान की भावना विकसित करना और लोकतांत्रिक व्यवस्था की समझ को मजबूत करना है। संबंधित अध्याय को उपयुक्त प्राधिकरण से परामर्श लेकर पुनः लिखा जाएगा। संशोधित पुस्तक शैक्षणिक सत्र २०२६-२७ के आरंभ में विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जाएगी।
परिषद ने इस त्रुटि पर गहरा खेद व्यक्त करते हुए क्षमा मांगी है और संस्थागत मर्यादा तथा संवैधानिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दोहराई है।