कर्नाटक HC ने SC-ST आरक्षण बढ़ोतरी रद्द की: सिद्दारमैया ने भाजपा पर लगाया जल्दबाज़ी का आरोप
सारांश
मुख्य बातें
कर्नाटक उच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति (SC) और अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए बढ़ाए गए आरक्षण को रद्द किए जाने के बाद कांग्रेस कार्यसमिति (CWC) सदस्य एवं कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया ने 13 अक्टूबर 2026 को पूर्ववर्ती भाजपा सरकार को इसका जिम्मेदार ठहराया। उनका आरोप है कि पूर्व भाजपा सरकार ने पर्याप्त संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा सुनिश्चित किए बिना चुनावी दबाव में जल्दबाजी में यह बढ़ोतरी लागू की। वहीं कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने पलटवार करते हुए मौजूदा कांग्रेस सरकार पर अदालत में कमज़ोर पैरवी का आरोप लगाया।
मुख्य घटनाक्रम
कर्नाटक उच्च न्यायालय के इस फैसले ने उस आरक्षण बढ़ोतरी को अवैध ठहरा दिया, जिसके तहत SC आरक्षण 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और ST आरक्षण 3 प्रतिशत से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया गया था। यह बढ़ोतरी 2023 के विधानसभा चुनाव से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई की भाजपा सरकार ने लागू की थी।
सिद्दारमैया ने कहा कि भाजपा सरकार को सर्वोच्च न्यायालय के इंद्रा साहनी मामले के उस फैसले की जानकारी थी, जिसमें कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक न रखने का निर्देश दिया गया था। इसके बावजूद पर्याप्त संवैधानिक आधार तैयार किए बिना यह निर्णय लिया गया।
सिद्दारमैया के आरोप और तर्क
सिद्दारमैया ने अपने बयान में कहा, 'आरक्षण कोई दान नहीं है — यह ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने और वंचित वर्गों को उचित प्रतिनिधित्व देने का एक संवैधानिक माध्यम है।' उन्होंने प्रश्न उठाया कि क्या भाजपा के लिए सामाजिक न्याय से बड़ा चुनावी लाभ था।
उन्होंने यह भी कहा कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में गठित न्यायमूर्ति नागमोहन दास समिति ने आरक्षण बढ़ाने के लिए आवश्यक आधार पहले ही तैयार कर दिया था। उनके अनुसार, बढ़े हुए आरक्षण की माँग किसी दल की उदारता नहीं, बल्कि दशकों के सामाजिक संघर्ष का परिणाम थी।
सिद्दारमैया ने 'अहिंदा' — यानी अल्पसंख्यक, पिछड़े वर्ग और दलित — समुदायों के प्रतिनिधित्व पर किसी भी समझौते को अस्वीकार्य बताया।
केंद्र सरकार पर निशाना
सिद्दारमैया ने केंद्र सरकार की भी आलोचना करते हुए कहा कि केंद्र ने मामले को अदालत में लंबित होने का हवाला देकर बढ़े हुए आरक्षण को संविधान की नौवीं अनुसूची में शामिल करने के कर्नाटक सरकार के अनुरोध को नकार दिया था। उन्होंने माँग की कि केंद्र अब स्पष्ट करे कि वह इस आरक्षण को बचाने के लिए कौन-सा संवैधानिक समाधान प्रस्तावित करता है।
उन्होंने यह भी कहा कि 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा से बंधे रहने के बजाय केंद्र को जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण बढ़ाने और उसे नौवीं अनुसूची में शामिल कर संवैधानिक सुरक्षा देनी चाहिए।
भाजपा का पलटवार
दूसरी ओर, कर्नाटक भाजपा अध्यक्ष बीवाई विजयेंद्र ने कांग्रेस पर निशाना साधते हुए कहा कि राज्य सरकार की कमज़ोर पैरवी के कारण अनुसूचित समुदायों के आरक्षण अधिकार को न्यायालय में झटका लगा। उनका कहना था कि भाजपा ने SC आरक्षण में 2 प्रतिशत और ST आरक्षण में 4 प्रतिशत की बढ़ोतरी की थी, जिसे कांग्रेस सरकार अदालत में बचाने में विफल रही।
विजयेंद्र ने चेतावनी दी कि यदि सरकार इस मुद्दे पर लापरवाही जारी रखती है, तो भाजपा अनुसूचित समुदायों की ओर से आंदोलन करने को मजबूर होगी। उन्होंने राज्य सरकार से हाई कोर्ट के फैसले पर तत्काल स्थगन माँगने का आग्रह किया।
आगे की राह
सिद्दारमैया ने राज्य सरकार से माँग की कि वह बढ़े हुए आरक्षण की रक्षा के लिए उचित कानूनी कदम उठाए और अदालत के आदेश से प्रभावित होने वाले छात्रों व नौकरी के अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा करे। गौरतलब है कि यह मामला अब संभवतः सर्वोच्च न्यायालय तक जाएगा, जहाँ आरक्षण सीमा और नौवीं अनुसूची की संवैधानिक व्याख्या फिर से केंद्र में आ सकती है।