आंतरिक आरक्षण विवाद: भाजपा की चेतावनी — सड़कों पर उतरेंगे समुदाय, सिद्दारमैया को नहीं मिलेगी माफी
सारांश
Key Takeaways
- मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की अध्यक्षता में 24 अप्रैल को आंतरिक आरक्षण पर विशेष कैबिनेट बैठक हुई।
- भाजपा सांसद गोविंद करजोल ने आरोप लगाया कि सिद्दारमैया सरकार ने खुद अदालत में एससी का आरक्षण 17%25 से 15%25 और एसटी का 7%25 से 3%25 करवाया।
- पूर्व मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने 2022 में आरक्षण बढ़ाकर कानून बनाया था, जो चार वर्षों तक लागू रहा।
- भाजपा ने 101 समुदायों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार आरक्षण देने और जस्टिस सदाशिव आयोग की सिफारिशें लागू करने की मांग की।
- 30 वर्षों से आंतरिक आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे समुदायों ने न्याय न मिलने पर सड़क प्रदर्शन की चेतावनी दी।
- भाजपा ने मुख्य सचिव के अधीन नई समिति बनाने पर सवाल उठाते हुए कहा कि पहले से रिपोर्टें मौजूद हैं, नई समिति मामला टालने की रणनीति है।
बेंगलुरु, 24 अप्रैल: कर्नाटक में आंतरिक आरक्षण का मुद्दा एक बार फिर राजनीतिक तूफान का केंद्र बन गया है। मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की अध्यक्षता में आंतरिक आरक्षण पर विशेष कैबिनेट बैठक आयोजित हुई, जिसके बाद कर्नाटक भाजपा ने कांग्रेस सरकार पर दलितों के साथ धोखा करने और समाज में जातीय टकराव भड़काने का गंभीर आरोप लगाया। भाजपा ने साफ चेतावनी दी कि राज्य की जनता इस मुद्दे पर मुख्यमंत्री को कभी माफ नहीं करेगी।
भाजपा का सीधा हमला — करजोल बोले, सिद्दारमैया का अहिंदा नेता कहलाने का हक नहीं
भाजपा के प्रदेश कार्यालय में मीडिया को संबोधित करते हुए पूर्व उपमुख्यमंत्री एवं भाजपा सांसद गोविंद करजोल ने कहा कि सिद्दारमैया को अहिंदा (दलित, अल्पसंख्यक और पिछड़ी जातियों का राजनीतिक गठबंधन) नेता कहलाने का कोई नैतिक अधिकार नहीं बचा है। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री ने दलित समुदायों को खुलेआम धोखा दिया है।
करजोल ने चेतावनी दी कि अगर न्याय नहीं मिला, तो पिछले तीन दशकों से आरक्षण के लिए संघर्ष कर रहे समुदाय सड़कों पर उतरने के लिए मजबूर होंगे। उन्होंने सरकार से कम से कम जस्टिस सदाशिव आयोग की सिफारिशों को लागू करने की अपील की।
बोम्मई सरकार की उपलब्धि बनाम सिद्दारमैया की विफलता
करजोल ने याद दिलाया कि भाजपा सरकार में तत्कालीन मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई ने दलित आंदोलन की मांगों को स्वीकार करते हुए अनुसूचित जातियों का आरक्षण 15 से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजातियों का 3 से बढ़ाकर 7 प्रतिशत किया था। यह निर्णय जनसंख्या अनुपात के अनुरूप था।
उस समय आरक्षण का बंटवारा इस प्रकार किया गया था — मडिगा और संबंधित समुदायों को 6 प्रतिशत, चलवाडी और उपजातियों को 5.5 प्रतिशत, लांबानी, भोवी, कोरमा और कोराचा समुदायों को 4.5 प्रतिशत, तथा घुमंतू समूहों को 1 प्रतिशत। यह विधेयक 2022 में दोनों सदनों से पारित होकर राज्यपाल की मंजूरी के बाद कानून बन गया था।
सिद्दारमैया सरकार पर आरक्षण घटाने का गंभीर आरोप
करजोल ने आरोप लगाया कि सिद्दारमैया सरकार अदालत में अपना पक्ष प्रभावी ढंग से नहीं रख पाई। आंशिक रोक के बाद सरकार ने स्वयं अदालत में मेमो दाखिल कर कहा कि वह 17 प्रतिशत और 7 प्रतिशत आरक्षण जारी नहीं रखेगी और 1995 के आदेश के अनुसार एससी के लिए 15 प्रतिशत और एसटी के लिए 3 प्रतिशत आरक्षण लागू करेगी।
उन्होंने जोर देकर कहा कि किसी भी अदालत ने 17 प्रतिशत और 7 प्रतिशत आरक्षण पर रोक नहीं लगाई थी — यह कटौती सरकार ने खुद अपनी मर्जी से की। इससे दलितों और जनजातियों के साथ सीधा अन्याय हुआ।
नई समिति पर सवाल — पहले से रिपोर्ट मौजूद, फिर भी देरी क्यों?
करजोल ने यह भी सवाल उठाया कि जब जस्टिस सदाशिव आयोग और जस्टिस नागमोहन दास की रिपोर्टें पहले से मौजूद हैं, तो सरकार मुख्य सचिव के अधीन एक और नई समिति बनाने का नैतिक अधिकार कैसे रखती है? उन्होंने इसे जानबूझकर मामले को लटकाने की रणनीति बताया।
भाजपा ने मांग की कि सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप 101 समुदायों को आरक्षण का उचित लाभ दे। पार्टी का कहना है कि पहले आंतरिक आरक्षण लागू किया जाए और बाद में जो भी कमियां सामने आएं, उन्हें दूर किया जा सकता है।
राजनीतिक संदर्भ — आरक्षण की आड़ में वोट बैंक की राजनीति?
गौरतलब है कि कर्नाटक में आंतरिक आरक्षण का संघर्ष पिछले 30 वर्षों से चला आ रहा है। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति वर्गों के भीतर विभिन्न उप-समुदाय लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि उनकी जनसंख्या के अनुपात में आरक्षण सुनिश्चित हो। विश्लेषकों का मानना है कि इस मुद्दे पर दोनों दलों की नजर 2028 के विधानसभा चुनावों पर टिकी है, जिसमें दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सिद्दारमैया सरकार कैबिनेट बैठक के बाद क्या ठोस निर्णय लेती है और क्या जस्टिस सदाशिव आयोग की सिफारिशें अंततः लागू होती हैं।