झांसी किले के द्वार पर विराजे विघ्नहर्ता: रानी लक्ष्मीबाई का वो प्राचीन गणेश मंदिर जहां हुआ था उनका विवाह
सारांश
Key Takeaways
- झांसी किले के प्रवेश द्वार पर स्थित यह प्राचीन गणेश मंदिर लगभग सन् 1760 ईस्वी में निर्मित माना जाता है।
- सन् 1842 में इसी मंदिर में राजा गंगाधर राव और मणिकर्णिका तांबे का विवाह हुआ था, जहां उन्हें 'रानी लक्ष्मीबाई' नाम मिला।
- रानी लक्ष्मीबाई इस मंदिर में प्रतिदिन दर्शन-पूजन करती थीं और यहां से शक्ति व प्रेरणा ग्रहण करती थीं।
- मंदिर के गर्भगृह में संगमरमर की दिव्य गणेश प्रतिमा प्रतिष्ठित है, जो मराठा स्थापत्य शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
- मंदिर के निर्माण का श्रेय विश्वास राव लक्ष्मण अथवा रघुनाथ राव नेवलकर को दिया जाता है — इतिहास में दोनों मत प्रचलित हैं।
- गणेश चतुर्थी पर घर में प्रतिमा लाने से पूर्व इस मंदिर में पूजा करने की परंपरा रानी लक्ष्मीबाई के काल से भी पहले से चली आ रही है।
झांसी, 25 अप्रैल (राष्ट्र प्रेस)। उत्तर प्रदेश के ऐतिहासिक नगर झांसी में झांसी किले के मुख्य प्रवेश द्वार पर एक ऐसा प्राचीन मंदिर मौजूद है, जो सिर्फ आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की एक अमिट धरोहर भी है। यह है विघ्नहर्ता भगवान श्री गणेश का वह पावन मंदिर, जहां वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई प्रतिदिन पूजा-अर्चना करती थीं और जहां सन् 1842 में उनका विवाह संपन्न हुआ था। यह मंदिर झांसी की धार्मिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान का अभिन्न अंग बन चुका है।
मंदिर का ऐतिहासिक महत्व और निर्माण की कहानी
इतिहासकारों के अनुसार यह प्राचीन गणेश मंदिर लगभग सन् 1760 ईस्वी में निर्मित हुआ था। इसके निर्माण को लेकर इतिहास में दो मत प्रचलित हैं। एक मत के अनुसार मराठा पेशवाओं के अधीन झांसी के सूबेदार विश्वास राव लक्ष्मण ने इस मंदिर की स्थापना करवाई थी। दूसरे मत के अनुसार नेवलकर राजवंश के संस्थापक रघुनाथ राव नेवलकर ने इसकी नींव रखी थी। हालांकि, दोनों ही मतों में एक बात समान है कि यह मंदिर मराठा स्थापत्य कला और आस्था का अनूठा संगम है।
मंदिर की वास्तुकला में एक विशेष गुंबदाकार ढांचा है, जो प्राचीन मराठा शैली की उत्कृष्ट शिल्पकारी का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करता है। मंदिर के गर्भगृह में संगमरमर से निर्मित भगवान गणेश की दिव्य और तेजस्वी प्रतिमा प्रतिष्ठित है, जिसका मुखमंडल अलौकिक आभा से दमकता प्रतीत होता है।
रानी लक्ष्मीबाई और इस मंदिर का अटूट रिश्ता
सन् 1842 में झांसी के राजा गंगाधर राव नेवलकर और मणिकर्णिका तांबे का विवाह इसी पवित्र मंदिर में वैदिक रीति-रिवाजों के साथ संपन्न हुआ था। इसी मांगलिक अवसर पर मणिकर्णिका को 'रानी लक्ष्मीबाई' का नाम प्रदान किया गया, जो आगे चलकर भारतीय स्वाधीनता संग्राम की सबसे प्रेरणादायी वीरांगना बनीं।
किंवदंती है कि रानी लक्ष्मीबाई नियमित रूप से इस मंदिर में आकर विघ्नविनाशक गणेश की उपासना करती थीं। माना जाता है कि वे यहां से शक्ति, साहस और मानसिक शांति ग्रहण करती थीं — वही शक्ति जो बाद में 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों से लोहा लेते समय उनके अदम्य साहस में प्रकट हुई।
धार्मिक परंपराएं और गणेश चतुर्थी का उत्सव
इस मंदिर की सबसे विशेष परंपरा यह है कि गणेश चतुर्थी के पावन पर्व पर यहां अत्यंत भव्य और धूमधाम से उत्सव मनाया जाता है। झांसी के स्थानीय निवासी आज भी अपने घरों में गणेश प्रतिमा लाने से पूर्व इस ऐतिहासिक मंदिर में आकर पूजा-अर्चना करते हैं और विघ्नहर्ता का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
यह परंपरा रानी लक्ष्मीबाई के काल से भी पहले से अनवरत चली आ रही है, जो इस मंदिर की लोकआस्था में गहरी जड़ों को दर्शाती है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु देश के विभिन्न कोनों से यहां दर्शन के लिए आते हैं।
झांसी की विरासत में मंदिर का स्थान
यह प्राचीन गणेश मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि झांसी की समृद्ध सांस्कृतिक और ऐतिहासिक विरासत का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। झांसी किले के साथ इस मंदिर का भौगोलिक सामीप्य इसे पर्यटकों और इतिहासप्रेमियों के लिए भी अत्यंत आकर्षक बनाता है।
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश सरकार के पर्यटन विभाग द्वारा झांसी को एक प्रमुख ऐतिहासिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किए जाने की दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में यह मंदिर धार्मिक पर्यटन के साथ-साथ हेरिटेज टूरिज्म को भी नई ऊंचाई दे सकता है।
आने वाले समय में गणेश चतुर्थी के पर्व पर इस मंदिर में विशेष आयोजनों की संभावना है, जो श्रद्धालुओं और पर्यटकों को समान रूप से आकर्षित करेंगे।