क्या केके बिड़ला उद्योग, संस्कृति और समाज के अद्वितीय सेतु हैं?

सारांश
Key Takeaways
- कृष्ण कुमार बिड़ला ने उद्योग, शिक्षा और साहित्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
- उन्होंने के.के. बिड़ला फ़ाउंडेशन की स्थापना की, जो उत्कृष्टता को पुरस्कृत करता है।
- राजनीतिक जीवन में भी उनकी भूमिका महत्वपूर्ण रही, वे राज्यसभा के तीन बार सदस्य रहे।
- उन्होंने बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान में प्रमुख पदों पर कार्य किया।
- उनका जीवन एक सशक्त सेतु है जो उद्योग और संस्कृति को जोड़ता है।
नई दिल्ली, 29 अगस्त (राष्ट्र प्रेस)। कृष्ण कुमार बिड़ला (केके बिड़ला) उन चुनिंदा उद्योगपतियों में से एक रहे हैं, जिन्होंने उद्योग, शिक्षा, साहित्य और सामाजिक जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समान रूप से योगदान किया और देश को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
उन्होंने वस्त्र, चीनी, इंजीनियरिंग, जहाजरानी, उर्वरक और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कई क्षेत्रों में एक दर्जन से अधिक कंपनियों का संचालन किया। वे एच.टी. मीडिया समूह के अध्यक्ष भी रहे, जिसके अंतर्गत प्रकाशित हिन्दुस्तान टाइम्स उत्तर भारत का प्रमुख अंग्रेज़ी दैनिक है, जबकि 'दैनिक हिन्दुस्तान' और 'कादम्बिनी' पत्रिका ने हिंदी पाठकों के बीच उच्च प्रशंसा प्राप्त की।
केके बिड़ला का योगदान राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में सदा याद किया जाएगा। उन्होंने पहले लोकसभा चुनाव में अपनी किस्मत आजमाई, परंतु सफल नहीं हो पाए। इसके पश्चात्, वे 1984 से 2002 तक लगातार तीन बार राज्यसभा के सदस्य चुने गए और विभिन्न संसदीय समितियों के सदस्य रहे। वे राष्ट्रीय एकीकरण परिषद, केंद्रीय उद्योग सलाहकार समिति और बोर्ड ऑफ़ ट्रेड जैसे महत्वपूर्ण निकायों से जुड़े रहे। स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया और आईसीआईसीआई के केंद्रीय बोर्डों के सदस्य होने के साथ-साथ उन्होंने एफआईसीसीआई के अध्यक्ष पद का कार्य भी किया।
11 नवम्बर 1918 को राजस्थान के पिलानी में जन्मे के.के. बिड़ला ने 1939 में लाहौर विश्वविद्यालय से स्नातक (ऑनर्स) की डिग्री प्राप्त की। 1997 में पांडिचेरी विश्वविद्यालय ने उन्हें डॉक्टर ऑफ लेटर्स (ऑनरिस कॉज़ा) की मानद उपाधि से सम्मानित किया। वे बिरला प्रौद्योगिकी एवं विज्ञान संस्थान (बिट्स), पिलानी के अध्यक्ष और कुलपति भी रहे।
साहित्य और संस्कृति से उनका गहरा जुड़ाव था। उन्होंने के.के. बिड़ला फ़ाउंडेशन की स्थापना की, जो साहित्य, विज्ञान, दर्शन, कला, संस्कृति और खेलों में उत्कृष्ट योगदान को पुरस्कृत करता है। साथ ही, के.के. बिड़ला अकादमी के माध्यम से वैज्ञानिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक शोध को प्रोत्साहित किया। अपने जीवन के अंतिम वर्षों में, वे दिल्ली में एक संग्रहालय और शोध केंद्र की स्थापना में लगे हुए थे।
केके बिड़ला एक व्यवसायी होने के साथ-साथ कला और संस्कृति के प्रेमी भी थे। उन्होंने इंदिरा गांधी: रेमिनिसेंसिज़ और पार्टनर इन प्रोग्रेस जैसी पुस्तकें भी लिखीं। 31 जुलाई 200830 अगस्त 2008 को उन्होंने इस संसार को छोड़ दिया।
कृष्ण कुमार बिड़ला केवल एक सफल उद्योगपति ही नहीं, बल्कि एक संवेदनशील साहित्य-प्रेमी, दूरदर्शी शिक्षाविद् और समाजसेवी भी थे। उनका जीवन उद्योग और संस्कृति के बीच एक सशक्त सेतु था।