क्या कुकी-जो विधायक मणिपुर सरकार गठन में शामिल नहीं होंगे: आईटीएलएफ?
सारांश
Key Takeaways
- कुकी-जो विधायक मणिपुर सरकार में शामिल नहीं होंगे।
- आईटीएलएफ का रुख स्पष्ट और अपरिवर्तित है।
- कुकी-जो समुदाय की सुरक्षा की मांगें अभी तक पूरी नहीं हुईं।
- मौजूदा हालात में अलग प्रशासन की मांग एक संवैधानिक आवश्यकता है।
- कुकी-जो काउंसिल भी सरकार गठन में भाग नहीं लेगी।
इंफाल, 10 जनवरी (राष्ट्र प्रेस)। मणिपुर में आदिवासी समुदायों का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रमुख संगठन इंडिजिनस ट्राइबल लीडर्स फोरम (आईटीएलएफ) ने शनिवार को पुनः स्पष्ट किया कि कुकी-जो जनजातीय समुदाय से जुड़े दस विधायक किसी भी स्थिति में राज्य सरकार के गठन की प्रक्रिया में सहभागिता नहीं करेंगे।
आईटीएलएफ ने कहा कि उनका रुख पूर्णतः स्पष्ट और अपरिवर्तित है, और जब तक कुकी-जो समुदाय की मूल मांगों का समाधान नहीं हो जाता, तब तक उनके विधायक सरकार गठन से दूरी बनाए रखेंगे। यह निर्णय मौजूदा परिस्थितियों में कुकी-जो समुदाय की सामूहिक भावना को दर्शाता है।
आईटीएलएफ के अध्यक्ष लेटपु हाओकिप और महासचिव थांगसुओलियन सिनेते ने एक संयुक्त बयान में कहा कि कोई भी कुकी-जो विधायक मणिपुर सरकार में शामिल नहीं होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि “यदि कोई विधायक इस निर्णय से हटता है तो उसे कुकी-जो लोगों की सामूहिक इच्छा और बलिदानों के साथ विश्वासघात माना जाएगा।”
बयान में कहा गया कि मई 2023 में मणिपुर में भड़की जातीय हिंसा के बाद, जब राज्य सरकार कुकी-जो लोगों की सुरक्षा करने में विफल रही थी, तब समुदाय के 10 विधायकों ने केंद्र सरकार से अलग प्रशासन की मांग की थी और यह रुख आज भी कायम है।
कुकी-जो समुदाय के इन 10 विधायकों में से सात भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से हैं, जबकि तीन अन्य स्थानीय दलों का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आईटीएलएफ ने बताया कि शुक्रवार को हुई बैठक में सर्वसम्मति से कुकी-जो काउंसिल (केजेडसी) की गवर्निंग काउंसिल के फैसले का समर्थन किया गया, जिसमें कहा गया है कि मौजूदा परिस्थितियों में कुकी-जो लोग मणिपुर सरकार के गठन में शामिल नहीं हो सकते और न ही होंगे।
संयुक्त बयान में आरोप लगाया गया कि कुकी-जो समुदाय को अमानवीय यातनाओं का सामना करना पड़ा है। लोगों की हत्या की गई, महिलाओं को नग्न घुमाया गया, जबरन इम्फाल घाटी से बाहर खदेड़ा गया। हजारों घर जलाए गए, धार्मिक स्थलों को नष्ट और अपवित्र किया गया और 40,000 से अधिक लोग अब भी आंतरिक रूप से विस्थापित हैं, जिन्होंने अपने घर, जमीन और आजीविका खो दी है।
आईटीएलएफ ने कहा कि मेइती बहुल इलाकों से कुकी-जो लोगों को हिंसा के जरिए अलग करना और जबरन विस्थापन ने आपसी विश्वास और सह-अस्तित्व को पूरी तरह तोड़ दिया है। ऐसे हालात में मौजूदा मणिपुर प्रशासनिक ढांचे के भीतर बने रहना संभव नहीं है। इसी कारण अलग प्रशासन की मांग एक संवैधानिक और राजनीतिक आवश्यकता बन गई है।
संगठन ने यह भी दोहराया कि कुकी-जो समुदाय ने केंद्र सरकार के समक्ष विधायिका सहित एक केंद्र शासित प्रदेश (यूटी) की मांग रखी है। आईटीएलएफ ने कहा, “जब इस राजनीतिक समाधान की औपचारिक मांग की जा चुकी है, तो मणिपुर सरकार में शामिल होने का कोई तर्क नहीं बचता।”
इससे पहले सप्ताह में कुकी-जो काउंसिल (केजेडसी) ने भी ऐलान किया था कि वह किसी भी हाल में मणिपुर सरकार के गठन में भाग नहीं लेगी। केजेडसी के अध्यक्ष हेनलियनथांग थांगलेट और महासचिव थांगजामांग ने संयुक्त बयान में कहा था कि संगठन ने मौजूदा राजनीतिक, सामाजिक और सुरक्षा हालात की गहन समीक्षा के बाद सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पारित किया है।
केजेडसी ने स्पष्ट किया कि यदि कोई व्यक्ति मणिपुर सरकार के गठन में शामिल होता है, तो इसकी जिम्मेदारी पूरी तरह उसी की होगी और परिषद इसके लिए किसी भी तरह से उत्तरदायी नहीं होगी।
हालांकि, केंद्र सरकार, भाजपा और सभी मेइती संगठनों ने कई मौकों पर कुकी-जो काउंसिल और आईटीएलएफ की विधायिका सहित अलग प्रशासन या केंद्र शासित प्रदेश की मांग को खारिज किया है।